– हरप्रकाश मुंजाल

अगर आप टीवी खोलते है तो आज का नजारा कुछ इस तरह नजर आता है- वो देखो काले रंग की तीसरी कार में रिया है, हम उसके पास पहुंच रहे है, सबसे पहले हम ही आपको बता रहें है कि रिया किस गाड़ी में है। इस तरह चिल्लाने और बे फिजूल की खबरों से ऊपर उठकर 1980 के दशक में एक युवा दूरदर्शन पर सादगी के साथ दुनिया के समाचार आपकाे बताता हुए मिलते थे, उस युवा का नाम था उमेश जोशी जी, जो अलवर जिले के बहरोड़ तहसील की नायसराना गांव के रहने वाले हैं। अलवर के लिए यह गौरव का विषय है कि एक ऐसा नाम हमारे साथ जुड़ा हुआ है जिन्हें देशभर में पत्रकारिताकी दुनिया में ईमानदारी के नाम से जाना जाता है। उन्हीं जोशी जी से हमने उनके पत्रकारिता के सफर व जिंदगी के अन्य पहलुओं पर विस्तार से बात की । प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश:-
सवाल- गांव में रहकर अक्सर या तो सरकारी नौकरी की बात होती है या खेती की, आप पत्रकार कैसे बन गए।
जवाब- कॉलेज में सपना देखा था कि पत्रकार बनना है। कैसे बनना है, इसका क ख ग जितना भी ज्ञान नहीं था। बस! सपना देखता था और रोजाना देखता था। 1967 में राजकीय महाविद्यालय नारनौल जिला महेन्द्रगढ़ में दाखिला लिया था। मेरा गांव नायसराना अलवर जिले की नीमराना तहसील (उन दिनों बहरोड़ तहसील थी) में है। अलवर के बजाय नारनौल के कॉलेज में दाखिला इसलिए लिया कि सप्ताहांत में घर जा सकूं और घर के कामों में हाथ बंटा सकूं। नारनौल का कॉलेज गांव से 11 किलोमीटर की दूरी पर था जबकि अलवर करीब 85 किलोमीटर दूरी पर । उन दिनों अखबार की ही पत्रकारिता मानी जाती थी। हालांकि कभी कभार बहुत गहराई में दबी हुई इच्छा भी सिर उठाने लगती थी और आकाशवाणी में समाचार पढ़ने का इरादा बनाने लगता था। लेकिन सारा जोश यह सोच कर ठंडा हो जाता था कि गंवई उच्चारण मुझे आकाशवाणी भवन के नजदीक भी नहीं पहुंचने देगा। उस कमजोरी का एहसास होते ही वो इच्छा फिर से दब जाया करती थी। उस समय टीवी की पत्रकारिता थी नहीं, इसलिए उस दिशा में यह बावरा चंचल मन कभी झांका भी नहीं। 1969 में बीए फाइनल में था तब मुझे कॉलेज की मैगजीन ‘त्रिधारा’ के हिन्दी सेक्शन (तीन धाराओं में से एक धारा) का संपादक बनाया गया। तब मैंने अपने सपने को इरादे की शक्ल में ढाला था। उस समय कमजोर-सा भरोसा तसल्ली देता था कि पत्रकारिता की पगडंडी पर आ गया हूँ तो देर सवेरे मंजिल भी मिल ही जाएगी। बीए के बाद अर्थशास्त्र में एमए किया। दो साल एमए की पढ़ाई के दौरान हर पल पहाड़-सा प्रश्न खड़ा रहता था- नौकरी का क्या होगा, मिलेगी या नहीं। इस दौरान मास कम्युनिकेशन और हिंदी में एमए की पढ़ाई भी पूरी कर ली । पारवारिक परिस्थितियों ने ‘कहीं कुछ भी मिल जाए’ से आगे की सोच के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी। अच्छी और सकारात्मक बात यह रही कि पत्रकार बनने का इरादा कमज़ोर नहीं पड़ा। एक साल प्रतीक्षा के बाद 1974 में सरकारी नौकरी मिली, बेमन से ज्वाइन करने कोलकाता (तब कलकत्ता होता था) चला गया। 1975 में केंद्रीय बजट पर मेरी समीक्षा कोलकाता से प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘सन्मार्ग’ में छपी थी। वो दिन मेरे जीवन में नए मोड़ की गाथा का साक्षी था। उस पैमाने को मापा जाए तो पत्रकारिता की शुरुआत 45 साल पहले हो चुकी थी।
इरादा और पक्का हुआ, प्रयास भी तेज़ किए लेकिन बात बनने में छह साल और लग गए। 1977 में कोलकाता से दिल्ली आ गया था। यहां संभावनाओं का अथाह सागर दिखाई दिया। मन की बेचैनी कम हुई और आस बंधी कि अब शायद मनचाहा मंच मिल जाए, संभवतः जल्दी ही। 1980 में अाकाशवाणी में अस्थायी उद्घोषक (एनाउंसर) के ऑडिशन (स्वर परीक्षा) हुई। वहां मेरा चयन हो गया। दिल्ली में राजस्थान पत्रिका के पूर्व दिल्ली ब्यूरो चीफ वीर सक्सेना जी आकाशवाणी में प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव होते थे। उन्होंने ही ऑडिशन लिया। जब वे आकाशवाणी छोड़ कर राजस्थान पत्रिका में आ गए तब उनसे घनिष्ठता हुई थी। ब्राडकास्टिंग के गुर आदरणीय सितांशु भादुड़ी जी ने सिखाए। सितांशु जी जया बच्चन के चाचा जी थे और भव्य व्यक्तित्व के धनी थे। कुछ दिनों बाद दिल्ली दूरदर्शन के हिंदी विभाग में समाचार संपादन का काम शुरू किया। सरकारी नौकरी भी बरकरार थी। समय में तालमेल बैठाना होता था। उसी दौरान हिंदी के समाचार वाचक शरत शशांक से न्यूज़ रूम में सप्ताह में 2-3 बार मुलाक़ात हो जाया करती थी। एक दिन शशांक ने सलाह दी- तुम्हारी आवाज़ बेहतरीन है, न्यूज़ रीडर का ऑडिशन क्यों नहीं देते। आकाशवाणी और दूरदर्शन में आज भी यही नियम है कि ऑडिशन पास किए बिना कोई भी आवाज़ ‘ऑन एयर’ नहीं जाती। एक बार ऑडिशन पास करने के बाद दो साल लगातार माइक्रोफोन से दूर रहते हैं ऑडिशन फिर से पास करना होता है। मैंने लिखित परीक्षा, मौखिक परीक्षा पास कर ऑडिशन दिया। प्रसिद्ध कहानीकार, कई फिल्मों की पटकथा और संवाद लेखक आदरणीय कमलेश्वर जी ने मेरा ऑडिशन लिया। वे उन दिन दूरदर्शन में अतिरिक्त महानिदेशक (एडीजी) होते थे। दूरदर्शन पर पहला बुलेटिन 26 दिसम्बर 1981 को पढ़ा था। उसके बाद दूरदर्शन से लगातार सन् 2000 तक जुड़ा रहा। अपने इरादे का एक और पड़ाव पार कर लिया था।

एक दिन आदरणीय बनवारी जी (जनसत्ता के स्थानीय संपादक) ने मुझे बताया कि इंडियन एक्सप्रेस अपना हिंदी अखबार ‘जनसत्ता’ निकाल रहा है, अर्जी लगा दो। साथ ही, यह भी स्पष्ट कर दिया था कि संपादक प्रभाष जोशी जी कोई पैरवी नहीं मानेंगे इसलिए पूरी तैयारी के साथ लिखित परीक्षा देना। लिखित परीक्षा पास करने के बाद इंटरव्यू के लिए बुलाया। प्रभाष जी ने पहला सवाल यही किया- सरकारी नौकरी छोड़ कर क्यों आना चाहते हो। हमारे यहां ना तो उतना पैसा है और ना ही नौकरी की सुरक्षा। मेरा जवाब था- अपने पर भरोसा है इसलिए सुरक्षा की चिंता नहीं है। पैसा मेरे लिए ज़्यादा अहमियत नहीं रखता। मुझे नियुक्ति पत्र मिल गया। उस दिन कॉलेज के ज़माने में देखा सपना पूरी तरह साकार हुआ वो भी करीब 16 साल बाद। सवा नौ साल की पक्की सरकारी नौकरी छोड़ कर मैंने 1 जुलाई 1983 को एक्सप्रेस बिल्डिंग से नाता जोड़ लिया । आजीवन प्राइवेट नौकरी की परेशानियां झेलने वाले मेरे पिता ने दो दिन खाना नहीं खाया था। यही कहते दो दिन भूख में गुज़ार दिए- नालायक ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। उस संस्थान में 4 मई 2004 तक रहा। सरकारी नौकरी में होता तो आज कम से कम 50 हज़ार रुपए पेंशन मिलती। मुझे कभी मलाल नहीं हुआ। कोई पूछे कि अगले जन्म में क्या बनना चाहेंगे तो मेरा एक ही जवाब होगा-पत्रकार। अन्याय और भ्रष्टाचार से लड़ना मेरे खून में हैं। जनसत्ता में लिखने की पूरी आजादी थी। प्रभाष जी ने कभी कोई पाबंदी नहीं लगाई। जनसत्ता में 21 वर्ष की नौकरी में, याद नहीं पड़ता, कभी 21 शब्द भी रोके गए हों।
सवाल- आपने बताया कि प्रभाषजी ने 21 साल में 21 शब्द भी नहीं रोके, पर आजकल तो कुछ अलग ही सुनने को मिलता है?
जवाब- आजकल क्या हो रहा है यह किसको नहीं पता, सोशल मीडिया पर एक जुमला चलता है पहले अखबार छपकर बिकते थे आजकल बिककर छपते है। यह भले जुमला हो पर सच के काफी नजदीक है। इसलिए इसके बाद कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है। हां पर मैं एक बात अवश्य कहना चाहता हूं कि आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो विपरीत परिस्थितयों में भी संघर्ष कर रहे है।
सवाल- कुछ ऐसी खबरें जो आपको आज भी याद हो और जिन्होंने आपको खुशी दी हो ।
जबाव- 1984 के लोकसभा चुनाव में नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार थे कृष्ण चंद्र पंत, कांग्रेस के दिग्गज नेता पंडित गोविंद वल्लभ पंत के सुपुत्र। उनके मुकाबले में बीजेपी से कंवर लाल गुप्ता थे। मैंने रिपोर्ट लिखी थी- बाप का बदला बेटे से चुकाएंगे। बीजेपी ने इस रिपोर्ट की लाखों प्रतियां (फोटोकॉपी) मतदाताओं को घर घर बांटी थी। लोग सुबह घर का दरवाजा खोलते थे तो उन्हें इस रिपोर्ट की कॉपी मिलती थी। दुकानों पर रखी रहती थी। जो भी सौदा लेकर जाता था उसे यह रिपोर्ट थमा देते थे। उस रिपोर्ट से उत्तरांचल के लोग बहुत बौखला गए थे। एक व्यक्ति ने मुझे पत्र भेजा कि फ़रवरी में परिवार के साथ जितना जीना चाहते हो जी लो, मैंने गंगाजल हाथ पर रख कर कसम खाई है कि तुम्हें और तुम्हारे परिवार को मार्च में खत्म कर दूंगा। मेरे बहुत अच्छे मित्र देवेंद्र उपाध्याय ने कई वर्ष मेरे से नाराज़ रहे और बात नहीं की। अब वो इस दुनिया में नहीं हैं। वो कहते थे कि तुमने पहाड़ के लोगों में दरार पैदा कर दी।

– दो विमान उड़ाने की साज़िश थी- कुमार आनंद जी के साथ संयुक्त बाइलाइन की यह रिपोर्ट खोजी पत्रकारिता की बेहतरीन रिपोर्ट मानी गई थी। एच. भीष्मपाल की पुस्तक ‘खोजी पत्रकारिता’ में उदाहरण के तौर पर इस रिपोर्ट को पहले स्थान पर रखा गया है। 23 जून 1985 को कनिष्क विमान में विस्फोट हुआ था। 329 यात्री मारे गए थे। राजस्थान के वर्ममान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उस समय केंद्रीय नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री थे। हम रात 10 बजे उनके पास गए। एक घंटे बातचीत हुई। उन्होंने बताया था कि जापान के हवाई अड्डे पर भी एक सामान में विस्फोट हुआ है। यह सामान टोरेंट से मुम्बई जा रही फ्लाइट में चढ़ाया जाना था। वो सामान चढ़ जाता तो दूसरा विमान भी हादसे का शिकार हो जाता। जो बात हमने अपनी रिपोर्ट में कही थी वही बात छह महीने बात रायटर ने कही और दुनिया खुफिया एजेंसियों ने भी जांच में यही पाया।
– एमएस शूज:- एक कंपनी एमएस शूज 800 करोड़ का पब्लिक इशू लेकर आ रही थी। करीब 80 करोड़ मीडिया में पब्लिसिटी के लिए खर्च करने की योजना था। मालिक ने समझौता करने के लिए बहुत मोटा लालच दिया। दिल्ली में मालवीय नगर के सरकारी अस्पताल में मेडिकल सुपरिन्टेन्डेन्ट मेरे पास यह खबर लेकर आए थे। बाद उन्होंने कहा कि मुझे यकीन नहीं था कि आप यह खबर लगा देंगे। मैंने उसका भांडा फोड़ा जिससे मालिक पवन सचदेवा गिरफ्तार हुए और पब्लिक इशू रूक गया और लाखों लोगों के करोड़ों रुपये डूबने से बच गए। पवन सचदेवा बर्बाद हो गए। कभी नहीं उठ पाए।
सवाल- क्या आपने कभी आकाशवाणी के लिए भी काम किया।
जवाब – जनसत्ता में आने के बाद आकाशवाणी में समाचार वाचक का ऑडिशन दिया, पास हो गया। उस ज़माने के दिग्गज समाचार वाचकों के साथ काम करने का सौभाग्य मिला। उनमें प्रमुख नाम हैं- देवकीनंदन पांडे, अशोक वाजपेयी, रामानुज प्रसाद सिंह, मनोज कुमार मिश्र, कृष्ण कुमार भार्गव, राजेन्द्र अग्रवाल, जयनारायण शर्मा, विनोद कश्यप, इंदु वाही सहित अनेक नाम हैं। देवकीनंदन पांडे जी और मनोज कुमार मिश्र से विशेष आत्मीयता थी। करीब 16 साल अाकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग से जुड़ा रहा।
सवाल- इस दौरान क्या कभी कोई विदेश यात्राएं भी की।
जवाब- 1990 में तबके यूएसएसआर में ग्लासनोस्त और पेरिस्त्रोइका यानी खुलेपन का दौर शुरू हो चुका था। मैं 1991 में यूएसएसआर के राजनीति, आर्थिक और सामाजिक हालात का अध्ययन करने दो महीने पूरे देश का भ्रमण किया। अविस्मरणीय अनुभव रहा। वहां से 1 मई 1991 को लौटा था। नवंबर में यूएसएसआर कई हिस्सों में बंट कर सीआईएस हो गया था। वहां भी एक न्यूज एजेंसी के लिए काफी लिखा। एजेंसी रूबल में भुगतान करती थी। भारत में रूबल की कोई कद्र नहीं थी इसलिए लौटने से पहले सारे रूबल भारतीय स्टूडेंट्स को दे आया। वहां पेट्रियट अखबार के ब्यूरो चीफ श्री राजीव शाह थे। अक्सर भारतीय भोजन करने उनके पास जाता थे। बाद में वे अमदाबाद में टाइम्स ऑफ इंडिया के एसोसिएट एडिटर हो थे। रिटायरमेंट के बाद अमदाबाद में रह रहे हैं। पत्रकारिता में उनका बड़ा नाम है।
देवू मोटर्स के निमंत्रण पर 10 पत्रकार दक्षिण कोरिया गए थे। उनमें मैं भी था। छह दिन वहाँ रहा। रोचक अनुभव वाली यात्रा थी। एक किस्सा कभी नहीं भूलता। देवू मोटर्स का एक प्लांट देखने गए। इत्तेफ़ाक़ से उस समय लंच हुआ था। वहां करीब छह हजार कर्मचारी थे। वे कब प्लांट से बाहर आए, कब लंच किया और कब काम पर लौट गए, पता ही नहीं चला। ग़ज़ब अनुशासन देखा। वहां के अफसरों ने बताया कि हमारे यहां मीटिंग कल्चर नहीं है यानी मीटिंग ना के बराबर होती हैं। यदि कभी मीटिंग करनी पड़े तो अपने लंच टाइम को काट कर मीटिंग करते हैं। काम का समय मीटिंग में बर्बाद नहीं करते।

1986 में दिल्ली से सिडनी के लिए सीधी फ्लाइट शुरू हुई थी। उसमें 29 एमपी और 10 पत्रकारों का शिष्टमंडल गया था। मुझे शिष्टमंडल का सदस्य बनने का सौभाग्य मिला। यादगार यात्रा थी। उस यात्रा के बारे में फिर कभी विस्तार से बताऊंगा।
मलेशिया की यात्रा भी की। वहाँ की संस्कृति का अध्ययन करने के लिए एक सप्ताह की यात्रा पर गया।
सवाल- क्या पत्रकारिता के साथ कोई दूसरा काम भी आप करते थे।
जवाब- दूसरा काम किया परंतु वह पत्रकारिता के ही कुटुंब का माना जाता है। एक संकल्प लेकर पत्रकारिता को अपनाया था। खबरों के नाम पर कभी पैसा नहीं लूंगा और बिना किसी दबाव के पत्रकारिता करूंगा, यह मेरा संकल्प था। जनसत्ता में उतना पैसा नहीं मिला जितना सरकारी नौकरी में मिलता था। बच्चों के खर्चे बढ़ रहे थे इसलिए अाकाशवाणी, दूरदर्शन के अलावा डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाने का काम भी किया। टोटल टीवी का हेड होने के बाद समय का अभाव था इसलिए डॉक्यूमेंट्री का काम बंद करना पड़ा। 2004 में जनसत्ता छोड़ने के बाद टोटल टीवी में सवा छह साल काम किया।
तीन चैनलों का हेड:-
दिसंबर 2010 में टोटल टीवी छोड़ने के बाद गोपाल कांडा ने अपने चैनल हरियाणा न्यूज़ की ज़िम्मेदारी सौंप दी। वहां 31 महीने एडिटर-इन-चीफ रहा। एक दिन अचानक लगा कि समझौतों की पत्रकारिता के खुद की नज़रों से ही गिर जाऊँगा। गोपाल कांडा जेल में थे। कंपनी के डायरेक्टर को छोटा-सा संदेश भेजा- आगे साथ नहीं दे पाऊंगा, इस्तीफा कहां भेजूं। तीन दिन बाद जवाब आया- गोविंद जी को भेज दीजिये। इस्तीफा दिया और घर चला आया।
इसके तुरंत बाद प्रवासी भारतीय सुदेश अग्रवाल ने अपने चैनल खबरें अभी तक की ज़िम्मेदारी दे दी। वहां सबसे खराब अनुभव रहा लेकिन अक्टूबर 2014 में हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले नहीं छोड़ सकता था, नैतिक मजबूरी थी। जहाँ पत्रकारिता की रोज़ाना हत्या होती हो, वहां रहना मुमकिन नहीं है।
ANI के लिए भी काफी समय काम किया। इसके अलावा डबिंग का भी अनुभव लिया। जनसत्ता से रात 11 बजे के आसपास घर आता था, 12 बजे डबिंग के लिए गुलमोहर पार्क के स्टूडियो चला जाता था। दो बजे घर लौटता था। कभी कभार ऐसा भी होता था कि उसके बाद आकाशवाणी या दूरदर्शन की सुबह ड्यूटी होती थी तो 5 बजे वहां चला जाता था। इतना सब इसलिए कर लेता था कि मेरा मनपसंद काम था। कभी काम को बोझ नहीं समझा।
इस पूरी यात्रा में एक बात का मुझे एहसास हुआ कि देश में संभवतः मैं अकेला पत्रकार हूँ जिसे अाकाशवाणी, टीवी और प्रिंट का इतना लंबा अनुभव है। अाकाशवाणी का16 साल, टीवी का करीब 33 साल और प्रिंट का 21 साल का अनुभव है। डॉक्यूमेंट्री और डबिंग का अनुभव झूंगे में मान लो।
सवाल- इतनी भागदौड़ के बीच परिवार के साथ आपका रिश्ता कैसा रहा।
जवाब- सरकारी नौकरी लगने के बाद शादी के लिए कई रिश्ते आने लगे। मुझे ध्यान था कि बेरोजगार उमेश जोशी के लिए एक रिश्ता आया था। आत्मा ने आवाज़ दी कि रोजगार मिलने के बाद उन्हें नहीं भूलना चाहिए। अब शादी वहीं करूंगा। नारनौल के छक्कड़ परिवार में शादी हो गई। ईश्वर ने तीन बेटियां आशीर्वाद स्वरूप दी हैं। बेटियों से बहुत खुश हूं। घर में सच्ची खुशियां बेटियां ही लेकर आती हैं। मुझे ठीक से याद है, जनसत्ता के मेरे साथी कुमार आनन्द को 1984 में बेटी हुई थी, तब पूरे स्टाफ को रसगुल्ले खिलाए थे। बेटे के समय मिठाई खिलाई थी लेकिन रसगुल्ले नहीं। बड़ी बेटी संज्ञा है। इसका पहला जन्मदिन कोलकाता में मनाया था। उसमें कई साहित्यकार आए थे। कहानीकार सविता बनर्जी (रजनीगंधा जैसी कई फिल्मों के डायरेक्टर बासु चटर्जी की बहन) डॉक्टर नगेन्द्र चौरसिया (दीपक चौरसिया के चाचा), हृदयेश पांडे (सफेद हाथी फ़िल्म के पटकथा और संवाद लेखक) भी जन्मदिन की पार्टी में आए थे। हृदयेश पांडे ने संज्ञा नाम रखा था। उनकी एक कहानी की नायिका का नाम संज्ञा और सहनायिका का नाम प्रज्ञा है। सभी की सहमति थी कि संज्ञा नाम रखा जाए। बेटी संज्ञा एमबीए के बाद एलएल. बी. की है।
दूसरी बेटी विधा कथक नृत्यांगना हैं। उसने बीए के साथ 14 साल लगातार कथक का प्रशिक्षण लिया है। 10 मार्च 2011 को कलर्स टीवी पर एक मिनट में 103 स्पिन (चक्कर) लेकर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। कथक का प्रतिष्ठित पुरस्कार अकादमी अवार्ड से भी सम्मानित किया गया है। देश के एकमात्र कला विश्विद्यालय, खैरागढ़ (छत्तीसगढ़) से नृत्य में एमए किया है। दो गोल्ड मैडल मिले हैं। करीब 30 देशों में स्टेज शो कर चुकी हैं। लंदन ओलिंपिक, चीन और उक्रेन में आयोजित इंडिया फेस्टिवल में स्टेज शो किया था।

सबसे छोटी बेटी साक्षी पत्रकार हैं। गर्व और दावे से कहता हूँ कि साक्षी ने हमेशा निष्पक्ष पत्रकारिता की है। कभी कोई दबाव नहीं माना। समझौता करने के बजाय नौकरी छोड़ना बेहतर समझा। 14 अगस्त को न्यूज़ 24 की नौकरी इसलिए छोड़ी कि उसे समझौता करना मंजूर नहीं था। अब वो अपना यूट्यूब चैनल ‘सत्यमेव जयते’ चला रही हैं। इससे पहले इंडिया टीवी, आईबीएन 7 ( अब उसका नाम न्यूज़ 18 है) और बीबीसी में काम कर चुकी है।
सभी से गुजारिश है कि बेटियों को आगे बढ़ाने में कोई कसर ना छोड़ें। उन्हें हर संभव अवसर मुहैया कराएं। समाज में बुराई और अत्याचार के खिलाफ लड़ने के संस्कार दें। वो बेटों से ज़्यादा ख़ुशियां देंगी।
गाँव से मेरा गहरा जुड़ाव है। बहुत भाता है मुझे मेरे गांव। शहर में रहना मजबूरी है। गांव आनंद का पर्याय है। जिस मिट्टी में बचपन बीता है उसकी सौंधी गंध महानगर में महसूस करता हूँ।
‌उमेश जी से पहली मुलाकात 1985 में जनसत्ता के कार्यालय दिल्ली में हुई तब मेरे साथ श्री बलवंत तक्षक जी भी थे जो अलवर से नए नए जनसत्ता के सवांददाता बने थे । उमेश जी तब बिजनेस पेज के प्रभारी हुआ करते थे । उन दिनों बलवंत जी की दो दिन लगातार अलवर की मंडियों पर बाई लाइन स्टोरी लगी । जब हम दिनों जनसत्ता ऑफिस में थे तब हरिशंकर व्यास जी ने मजाकिया लहजे में कहा उमेश जी पर क्षेत्र वाद हावी हो गया लगता है । व्यास जी की तब जनसत्ता में तूती बोलती थी और प्रभाष जी के बाद उन्हीं का ही नम्बर आता था ।इस पर हम सब काफी देर तक खूब हंसते रहे । उमेश जी से फिर अलवर में राजेश रवि जी की शादी में मुलाकात हुई । जोशी जी का जब भी अलवर आगमन होता उनसे बातचीत का अवसर मिलता । जोशी जी स्वस्थ्य और दिर्घायु रहे इसी कामना के साथ ।