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देश को मालूम हो,कौन कहाँ रहता है

– राकेश दुबे
केंद्र सरकार ने जनगणना-2021 की प्रक्रिया शुरू करने के साथ ही राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को अपडेट करने की मंजूरी दे दी है। जनगणना पूरे देश की होगी, जबकि एनपीआर में असम को छोड़कर देश की बाकी आबादी को शामिल गया है। असम को इस प्रक्रिया से इसलिए बाहर रखा गया है, क्योंकि वहां एनआरसी हो चुका है।

एनपीआर को लेकर केंद्र सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब देश में एक बड़ा वर्ग नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ उद्वेलित है। देश में बड़ी आबादी ऐसी भी है, जो एनसीआर और एनपीआर में अंतर नहीं समझती। इसलिए राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में अंतर समझना-समझाना आवश्यक है। एनआरसी का उद्देश्य देश में अवैध घुसपैठियों की पहचान करना है। असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर वहां एनआरसी कराया गया था। दूसरी ओर एनपीआर के तहत देश की सीमा के भीतर रह रहे प्रत्येक व्यक्ति का ब्योरा जुटाना है!

विश्व के अधिकतर देशों में एनपीआर का प्रावधान है। महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय एनपीआर की व्याख्या इस तरह करता है : एनपीआर देश के सामान्य निवासियों का एक रजिस्टर है। यह नागरिकता अधिनियम 1955 और नागरिकता (नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र) नियम-2003 के प्रावधानों के तहत स्थानीय (ग्राम/उप-टाउन), उप-जिला, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तैयार किया जा रहा है। प्रत्येक सामान्य निवासी के लिए एनपीआर में पंजीकरण कराना अनिवार्य है। एक सामान्य निवासी एनपीआर के उद्देश्यों के तहत वह व्यक्ति है, जो पिछले 6 महीने या उससे अधिक समय से स्थानीय क्षेत्र में रहता है या जो अगले 6 महीने या उससे अधिक समय तक उस क्षेत्र में निवास करने का इरादा रखता है। एनपीआर का उद्देश्य देश में हर सामान्य निवासी का एक व्यापक पहचान डेटाबेस तैयार करना है। डेटाबेस में जनसांख्यिकीय के साथ-साथ बॉयोमीट्रिक विवरण शामिल होंगे। प्रत्येक सामान्य निवासी के लिए यह जनसांख्यिकीय विवरण आवश्यक है, जिसके तहत नाम, मां-पिता या पति का नाम, लिंग, जन्म तिथि, वैवाहिक स्थिति, जन्म स्थान, राष्ट्रीयता, वर्तमान पता, वर्तमान पते पर रहने की अवधि, स्थायी निवास पता, व्यवसाय, शैक्षणिक योग्यता से लेकर वर्तमान स्थिति की जानकारी देनी होगी।

इस डेटा संकलन के लिए मोबाइल एप और निगरानी के लिए केंद्रीय पोर्टल का इस्तेमाल होगा। सरकार कह चुकी है कि लोगों से कोई दस्तावेज या कोई बायोमीट्रिक डेटा नहीं मांगा जाएगा। वे जो कुछ जानकारी देंगे, उसे स्व-घोषणा के रूप में मान लिया जाएगा। हालांकि रजिस्ट्रेशन नहीं करने व गलत जानकारी देने पर कानून में दंड का प्रावधान भी है। इससे पहले 2010 में पहली बार तैयार एनपीआर को 2015 में अपग्रेड किया गया। उससे मिले आंकड़ों का केंद्र व राज्य सरकारें विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लिए लाभार्थियों की पहचान करने में इस्तेमाल करती रही हैं। अब सरकार देशव्यापी डेटा एकत्र तो कर रही है, लेकिन उसकी यह भी जिम्मेदारी है कि वह इसका दुरुपयोग रोकने व इसे चोरी होने से बचाने के ठोस इंतजाम करे, क्योंकि अतीत में ऐसा हो चुका है। आधार का डेटा चोरी होने का मामला सभी के सामने है। बहरहाल, कई विपक्षी दल इसे भी राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश में लग गए।

अच्छा हुआ कि गृहमंत्री अमित शाह ने समय पर सफाई दे दी कि एनपीआर का एनआरसी से कोई संबंध नहीं है। दरअसल, अतीत के कटु अनुभवों से विपक्ष को भी आशंकाएं रहती हैं। दूसरी ओर हम सभी को यह भी समझना होगा कि देश के लिए एनपीआर आवश्यक है। देश को मालूम होना चाहिए कि उसके यहां कौन-कौन रहते हैं। विपक्षी दलों व अन्य संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वह इस मामले में राजनीति करने की बजाय लोगों को सही जानकारी दें। उम्मीद करनी चाहिए कि गृहमंत्री के स्पष्टीकरण के बाद अब इस मसले पर राजनीति नहीं होगी। यही देश और समाज के हित में है।