Uncategorized

रंगमंच जीवन को जानने, समझने तथा जीने की कला सिखाता है-प्रो. राजबीर

-विजय तेंदुलकर द्वारा लिखित नाटक खामोश अदालत जारी है – दर्शकों का मन मोहा


हर्षित सैनी
रोहतक, 2 मार्च। सामाजिक बुराईयों पर कड़ा प्रहार करते हुए, समाज के विसंगतियों पर करारा व्यंग्य करते हुए आज प्रतिष्ठित लेखक लेखक-नाट्य कर्मी विजय तेंदुलकर द्वारा लिखित नाटक खामोश अदालत जारी है, का मंचन महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (मदवि) के राधाकृष्णन सभागार में किया गया।
म.द. विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित किए जा रहे रंग महोत्सव मेगा-इवेंट के अंतर्गत ‘रंग रास’ थिएटर महोत्सव के तहत इस लोकप्रिय नाटक ख़ामोश अदालत जारी है, का मंचन हुआ।

पंजाबी विश्वविद्यालय (पटियाला) के थिएटर विभाग के विद्यार्थियों ने विभागाध्यक्ष डा. जसपाल कौर देवल के मार्गदर्शन में इस नाटक का प्रभावी मंचन किया। नाटक का निर्देशन जसप्रीत सिंह ने किया। निर्देशन सहयोग अरुणदीप शर्मा ने किया।
इस रंग रास इवेंट में आज प्रसिद्ध नाट्यकर्मी एम.के. रैना बतौर विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता मदवि कुलपति प्रो. राजबीर सिंह ने की। मदवि कुलपति प्रो. राजबीर सिंह ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि रंगमंच से बढक़र अभिव्यक्ति का कोई माध्यम नहीं है।
कुलपति ने कहा कि रंगमंच जीवन को जानने, समझने तथा जीने की कला सिखाता है। प्रो. राजबीर सिंह का कहना था कि विभिन्न सामाजिक बुराईयों से जूझने के लिए थिएटर प्रभावी माध्यम है। कुलपति ने कहा कि भविष्य में मदवि में थिएटर संबंधित पाठ्यक्रम प्रारंभ करने बारे विचार किया जा रहा है।

प्रसिद्ध नाट्यकर्मी एम.के. रैना ने इस अवसर पर कहा कि थिएटर ज्ञान-विस्तारण का एक सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि संस्कृति को पुष्पित-पल्लवित करने में थिएटर प्रभावी माध्यम है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के इस युग में थिएटर समेत अन्य सांस्कृतिक माध्यम मानवीय मूल्यों का सम्प्रेषण करते हैं।
थिएटर उत्सव रंग रास के संयोजक पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के माध्यम तथा मानविकी संकाय के अधिष्ठाता प्रो. हरीश कुमार ने स्वागत भाषण दिया। प्रो. हरीश कुमार ने रंग रास इवेंट का विस्तृत ब्यौरा दिया। प्रो. हरीश कुमार ने कहा कि थिएटर जनसंचार का विशिष्ट माध्यम है। उन्होंने कार्यक्रम समापन पर आभार जताया।
इस इवेंट के सह-संयोजक निदेशक युवा कल्याण जगबीर राठी ने कार्यक्रम का संचालन किया। उन्होंने बताया कि 2 मार्च तथा 3 मार्च को क्रमश: संध्या छाया तथा हीर रांझा नाटकों का मंचन होगा।
इस नाटक मंचन की प्रस्तुति में मदवि की पहली महिला डा. शरणजीत कौर, डीन, अकेडमिक एफेयरस प्रो. नीना सिंह, डीन, स्टूडेंट वेल्फेयर प्रो. राजकुमार, प्रो. सुरेन्द्र कुमार, डा. श्रीभगवान, डा. मंजीत कौर, प्रो. प्रमोद भारद्वाज, प्रो. रश्मि मलिक, डा. बिजेन्द्र गठवाला, दुष्यंत कुमार, अभिजीत सरकार, सुनित मुखर्जी, रमणीक मोहन, प्रताप राठी, डा. आनंद शर्मा, के.एल. भाटिया, समेत विवि समुदाय के सदस्य, विद्यार्थी, रोहतक के जि़ला एवं सत्र सत्र न्यायाधीश ए. एस. नारंग तथा उनकी धर्मपत्नी इस कार्यक्रम में विशेष रूप से उपस्थित रहे।
प्रो. जसपाल कौर देवल ने इस अवसर पर कहा कि मदवि ने रंग रास थिएटर फेस्टिवल से बेहतरीन पहल की है। भविष्य में भी उनका विभाग मदवि में नाट्य प्रस्तुति के लिए अवश्य आना चाहेगा।

इस नाट्य प्रस्तुति में गुरप्रीत सिंह, बुट्टा सिंह, लवप्रीत वशिष्ठ, अरुणदीप सिंह, रमनदीप सिंह, रमनदीप कौर, मुकुल ग्रोवर, शोभित मिश्रा, शीला कुमारी, श्रद्धा, कुलदीप सिंह, सुखचैन ने भाग लिया। तकनीकी सहयोग बलविंदर सिंह, हरमीत सिंह, बलविंदर बल्ली ने किया। ख़ामोश अदालत जारी है, नाटक ने उपस्थित जन का मनोरंजन किया तथा सार्थक सामाजिक संदेश दिया।
इस नाटक की मुख्य पात्र लीला बेनारे है। जो एक शिक्षिका होती है और स्कूल में पढ़ाती है। हर मोड़ पर उसका शोषण किया जाता है। लीला जब पुरूष प्रधान समाज के खिलाफ आवाज उठाती है तो उसे झूठे मुकदमे में फंसा दिया जाता है। केस शुरू होता है और उस पर कई लांछन लगाए जाते हैं, उसके व्यक्तिगत जीवन पर तंज होते हैं। नाटक में लीला बेनारे की जीवन कथा जैसे-जैसे खुलती है। वैसे-वैसे समाज की सफेद सतह के नीचे मर्दाना यौन कुंठाओं और स्त्री के दमन की कई तह उजागर होती जाती हैं।
नाटक के आखिर में दिखाया गया है कि इतना सब होने पर भी लीला हौंसला नहीं हारती है और मजबूती से उठ खड़ी होती है। निर्णय लेती है कि वह इस अन्याय के खिलाफ डर कर नहीं रहेगी और इसका डटकर मुकाबला करेगी

इस नाटक के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया कि पुरूषों के समाज में औरत को किस प्रकार हाशिए पर रखा गया, लेकिन वह इस मानसिकता से जूझते हुए खुद को उभारने का प्रयास जारी रखती है। नाटक का निर्देशन पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के थियेटर विभाग के प्रो. जसपाल देओल ने किया।
प्रो. राजबीर