– हिंदी साहित्य व पत्रकारिता का जाना पहचाना नाम
– ओम एक्सप्रेस 2019 पर्सनेलिटी अवॉर्ड सम्मनित

– हरप्रकाश मुंजाल, अलवर

” बन्दूउ गुरु पद पदुम परागा । सुरुचि सुबास सरस् अनुरागा ।। अमिअ मूरिमय चूर्ण चारु । सुमन सकल भव रुज परिवारु ।। श्रीगुरु पद नख मनि गन जोति । सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती ।। दलन मोह तम सो सप्रकासू । बड़े भाग उर आवइ जासू ।।” यानी मैं गुरु महाराज के चरणकमलों की रज की वंदना करता हूं, जो सुरुचि(सुंदर स्वाद),सुगंध तथा अनुरागी रूपी रस से पूर्ण है । वह अमर मूल(संजीवनी जड़ी )का सुंदर चूर्ण है जो सम्पूर्ण भव रोगों के नाश करने वाला है ।

श्री गुरु महाराज के चरण – नखो की ज्योति मणियों के प्रकाश के समान है, जिसके स्मरण करते ही ह्रदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है ।वह प्रकाश अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करने वाला है, वह जिसके ह्रदय में आ जाता है, उसके बड़े भाग्य है ।”

गोस्वामीतुलसीदास जी ने रामचरित मानस की रचना से पूर्व अपने गुरु शिव शंकर से वंदना कर रामकथा लिखने की अनुमति मांगी थी । आज मैं भी अपने गुरू श्री ईशमधु तलवार के पत्रकारिता जीवन के 43 वर्षो के सफर को समेटने का प्रयास कर रहा हूं और गुरु की वंदना कर लिखने की हिम्मत जुटा रहा हूं । गुरु पर लिखना बहुत ही मुश्किल काम है जैसे आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा है ।

लेकिन फिर भी उनके सुनहरी सफर की यात्रा की मंगल रुपी माला पिरोने की कोशिश कर रहा हूं । श्री तलवार जी मेरे पड़ोसी गांव बगड़ राजपूत के निवासी हैं । मैने मिडिल स्कूल की शिक्षा इन्हीं के गांव से ली है । हमारे यह प्राइमरी तक का ही स्कूल था करीब सात किलोमीटर के दायर केवल मिडिल स्कूल बगड़ राजपूत में ही था । आस पास के सेकड़ो बच्चे यहां पढ़ने के लिए आते थे । मुझे कुछ कुछ याद है कोंग्रेस के कद्दावर नेता जुबेर खा भी छटी कक्षा यही से पास की है । बाकी रामगढ़ प्रधान रहे नसरू खा ने मिडिल तक की शिक्षा इसी स्कूल से ली है ।

तलवार जी के परिवार की गांव में बहुत इज्जत हुआ करती थी । इनके पिता की बड़ी प्रतिष्ठा थी । आस पास के गावों के लोग रमेश बाबूजी के नाम से पुकारे थे । गांव में मात्र एक पंजाबी परिवार था जो सबकी आंखों के तारा था । इनकी माता जी को लोग आज भी याद करते हैं जब भी गाव में कोई बीमार हो जाता उनके घर पर दवाई लेने आते और दवाई मुफ्त में दी जाती । माता जी शहर से बड़ी मात्रा में बुखार आदि की दवाइयां मंगा लिया करती थी जब कोई बीमार होता चाई जी से दवा ले आता । इनकी माता जी गांव से अथाह प्रेम था । और उनकी अंतिम इच्छा थी कि मेरा अंतिम संस्कार गांव में ही हो । और उनकी अंतिम इच्छा पूरी भी हुई । जब शव यात्रा गांव से गुजर रही थी तब गांव महिलाएं घरों से बाहर आ गई और उन्हें सिर झुका नमन किया । शव यात्रा को देख ग्रामीण दंग रह गए और बतियाने लगेकी इनके बेटे कितने संस्कार वान है की इतनी बड़ी संख्या में लोग आए हैं।

श्री ईशमधु तलवार जी ने बाल अवस्था में ही लिखने शुरू कर दिया । गाव के पडोसी मंगल जांगिड़ इनके दोस्त थे । इन्होंने मधु मंगल के नाम से राष्ट्रीय स्तर की बाल पत्रिकाओं में कहानियां भेजना शुरू कर दिया । इनके स्कूल चले जाने बाद इनकी माता जी रचनायें पोस्ट करती । नवी कक्षा में पढ़ते हुए चर्चित बाल पत्रिका” बाल भारती” में पहला आलेख छपा । तब पारिश्रमिक के रूप में 10 रुपये का मनी आर्डर आया । ये 10 रुपये इनकी पहली कमाई थी । इन्होंने बचपन मे ही तय कर लिया था कि ये साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र ही में जाएंगे । हालाँकि इनके ताया जी पुलिस में थे इनके परिवार जन चाहते थे कि ये भी पुलिसकी नोकरी अपने ताया जी की तरह करे । पर इनके तो लिखने का शोक स्वर था ये कहा मानने वाले थे ।
गांव छोड़कर ये अलवर बस गए । यहाँ पॉश कॉलोनी लाजपतनगर में स्वंय का मकान बना लिया , यही रहकर इन्होंने राजऋषि कॉलेज से बीएससी की। बाद में एलएलबी, हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर और राजस्थान विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री ली ।
1977 में अशोक शास्त्री और जगदीश शर्मा जी के साथ “अरानाद” में काम शुरू किया, तब संपादकीय विभाग में केवल ये तीन लोग हुआ करते थे और इन्हे कोई वेतन आदि नहीं मिला करता था। मास्टर बंशीधर मिश्र की प्रेस पर ये अखबार छपता था, जहां शाम को जुग मंदिर तायल, भगीरथ भार्गव, ओ पी माथुर, सुरेश पंडित आदि के साथ साहित्यिक अड्डेबाजी होती थी।

“अरानाद”अखबार को बाद में अशोक जोशी ने खरीद लिया तो इसके संपादक तलवार जी बने । जगदीश शर्मा जी पत्रिका के संवाददाता थे, जो जयपुर जा चुके थे। बाद में अशोक शास्त्री जी अलवर में पत्रिका संवाददाता बने और फिर वो भी जयपुर चले गए। इससे पहले अशोक शास्त्री जी के साथ इन्होंने “कुतुबनुमा” पत्रिका भी निकाली।
अशोक शास्त्री जी के जयपुर जाने के बाद अलवर में ईशमधु तलवार पत्रिका के संवाददाता बने ।

फिर सुशील झालानीजी ने अरुणप्रभा अखबार शुरू किया जिसके संस्थापक संपादक तलवार जी बने । तब इनके साथ मैने भी पत्रकारिता की शुरुआत इसी अखबार से की । तलवार जी के सहयोगी के रूप में उस समय चन्द्र शेखर आजाद ( अब सेवा निवर्त जिला सेशन जज), बलवंत तक्षक,। बाद में देवेंद्र भारद्वाज, कपिल भटट, मोहन बेनीवाल , लोकेश माथुर,, स्वर्गीय गोपी चंद वर्मा एडवोकेट भी जुड़े । खैरथल से प्रहलाद मंगलानी जी, जोड़िया से नरेश गुप्ता।, टहला से शशिकांत जेमन, रामगढ़ से स्वर्गीय कमल गोयल, तिजारा से प्रमोद जैन, झब्बू राम, मामराज सोनी आदि सवांददाता थे ।इस दौरान अलवर में पहली बार पत्रकार संघ बना, जिसका पांच साल तक तलवार जी अध्यक्ष रहे । साथ ही “पलाश” संस्था बना कर अध्यक्ष के रूप में अलवर में साहित्यिक गतिविधियां शुरू की, जिनमें जैनेंद्र कुमार जैसे बड़े लेखक आए। आधुनिक नाटकों की अलवर में “थैंक यू मिस्टर ग्लाड” से शुरुआत की। एक साहित्यिक पत्रिका “आखर” भी निकाली, जिसका विमोचन मणि मधुकर ने किया था।

अलवर जिले में अरुणप्रभा तब राजस्थान पत्रिका से ज्यादा बिकता था। इसलिए कुलिश जी का दबाव था कि तलवार जी भी जगदीश और अशोक शास्त्री की तरह जयपुर आ जाए लेकिन उन्होंने पारिवारिक कारण बताए तो कुलिश जी ने टेलीप्रिंटर लगा कर इनके घर में दफ्तर खोल दिया । शर्त यह थी कि इन्हें अरूणप्रभा छोड़ना पड़ेगा। अरुण प्रभा छोड़ने के स्वतः ही फिर दूसरे कारण बने। राजस्थान में किसी भी जिले में तब तलवार जी पत्रिका के अकेले ऐसे पत्रकार थे जिन्हें पालेकर अवार्ड से वेतन मिलता था।

जयपुर में नवभारत टाइम्स शुरू होने वाला था तो कुलिश जी पत्रिका के सात साल के कार्यकाल में पहली बार अलवर आए, और तलवार जी को रोकने के लिए। फूलबाग पैलेस होटल में रुके। वहां बुलाकर उनसे कहा कि जयपुर ही आना है, तो पत्रिका में आ जाओ पर

नियति में कुछ और ही लिखा था । तब जयपुर नवभारत टाइम्स में चीफ रिपोर्टर बन गये ।

– हिंदी साहित्य में गहरी पैठ
राजकमल प्रकाशन से तलवार जी का एक उपन्यास प्रकाशित हो चुका है-“रिनाला खुर्द।” साथ ही एक कहानी संग्रह भी छपा है – “लाल बजरी की सड़क।” बॉलीवुड के प्रसिद्ध संगीतकार दान सिंह के जीवन संघर्ष पर लिखी पुस्तक ‘वो तेरे प्यार का गम’ इनकी चर्चित कृति है। एक व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है – “इशारों – इशारों में।”

राजस्थान सरकार के भाषा एवं पुस्तकालय विभाग की ओर से 2019 में हिंदी सेवा पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है ।।
राजस्थान साहित्य अकादमी की ओर से साहित्यिक एवं रचनात्मक पत्रकारिता के लिए 2013 में पुरस्कृत हो चुके हैं।

‘सारिका’, ‘हंस’, ‘पाखी’, ‘नया ज्ञानोदय’, ’कथादेश’, ’बया’, ’मधुमति’ आदि हिन्दी साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में इनकी कहानियां छप चुकी हैं।

दो नाटकों- ‘लयकारी’ और ‘फेल का फंडा’ के अनेक मंचन हुए हैं।

देश के पहली पंक्ति के हिंदी अखबारों-नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, राजस्थान पत्रिका, पंजाब केसरी और अन्य अखबारों में रिपोर्टर, चीफ रिपोर्टर, संपादक आदि महत्वपूर्ण भूमिकाओं में काम किया। सबसे बड़े इलेक्टॉनिक मीडिया समूह टीवी-18 के ईटीवी राजस्थान के संपादक रहे।

इस तरह पत्रकारिता में 43 साल हो गए।दिल्ली का राजकमल प्रकाशन देश में हिंदी का नंबर एक प्रकाशक है, जिसके 70 साल में राजस्थान से सात लेखकों की किताबें भी अभी तक नहीं छपी होंगी।लेकिन तलवार जी की राजकमल से दो किताबें आ चुकी हैं और तीसरी प्रकाशनाधीन है।

तलवार जी की विनम्रता और सादगी का कोई जवाब नही है । हंस मुख रहते हैं । कभी किसी को किसी काम के लिए ना नही करते हैं । ” ना ” तो इनके शब्द कोष में है ही नहीं । युवा पत्रकारों खूब प्रोत्सहित करते हैं । मेहनत करने पर जोर देते हैं । इनके बचपन के दोस्त मदन गुप्ता , घनश्याम शर्मा, मुकेश शर्मा, अखिल मेहता से इनके सम्बंध वैसे ही है जैसे बरसो साल पहले थे । दुख सुख की घड़ी में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं । आप स्वाथ्य रहे, चुस्त दुरुस्त रहे। छोटे भाईयो पर आपका आशीर्वाद बने रहे , इसी कामना के साथ ।