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एक निर्भीक कर्मशील जीवन

असहज होना कमजोर होना माना जाता है, मगर वह कमजोर नहीं होता । वह ऐसी सोच के सागर में आत्मविश्वास का एक पत्थर फेंक दे तो त्वरित तरंगे प्रवाहित कर एक नया इतिहास रचती है । आत्मविश्वास के साथ अपनी अलहदा पहचान रखने वाली, हिम्मत और लगन के साथ कदम दर कदम हौसलों की उडान भरने वाली संतोष भाटी की बात करता हूं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में अपने दम पर कुछ नेक काम करने का ठान लिया और पूरे मनोयोग से उसे कर दिखाया । भाटी अपने समय की निर्भीक एवं दयालु प्रवर्ति की चंचल लडकी हुआ करती थी ।

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सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करना, छोटी उम्र में लोक लाज निभाना इतना आसान नहीं होता किंतु संतोष ने हंसते हुए यह सब कर दिखाया । अपने सामाजिक सरोकारों को कुशलता से निभाना कोई इनसे सीखे । कोई व्यक्ति कितना ही तेज तर्रार क्यों ना हो जब इनसे पाला पडता है तो वह आगे-पीछे (गुण-अवगुण) का सोचकर ही इनसे बात करता था । संतोष का जीवन मरुधरा के उन सोनलिया धोरों की तरह उतार चढाव वाले संघर्ष का रहा किंतु उसकी चमक और आभा में कभी कोई कमी नहीं आई ।


आजादी के एक दशक बाद एक मध्यम किंतु प्रभावशाली परिवार में गिरधारीलालजी भाटी के यहां पैदा होने वाली संतोष भाटी ने कभी अवगुणों से समझौता नहीं किया । साफ मन की इस बच्ची ने अपनी पढाई की तरफ ही ध्यान दिया । जगमण कुए से राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विध्यालय, महर्षि दयानन्द मार्ग तक का सफर वह 10 मिनट में तय कर लेती । अपने रास्ते आना- जाना व पढाई की तरफ मन लगाना ही इनका ध्येय रहा । जब यह बच्ची कक्षा 10 वीं में आ गई तो मां-बाप को शादी की चिंता सताने लगी और उन्होंने इस बच्ची के लिए योग्य वर ढूंढना शुरु कर दिया ।

ईश्वर की कृपा से जल्दी ही सुयोग्य धीरज वाला परिवार गिरधारीलालजी की नजर में आ गया जो इस विध्यालय के पीछे ही मालियों के मौहल्ले में सात भाईयों का बडा परिवार रहता था उसमें छठे नम्बर के बेटे मेघराजजी कच्छावा के नाम से प्रसिद्ध था । प्रसिद्ध इसलिए था कि एक बेटी और दो बेटों को जन्म देकर इनकी श्रीमती का देहान्त हो गया । बच्चे छोटे थे, परिवार का दबाव दुबारा शादी करने के लिए मेघराजजी पर बन रहा था । मेघराजजी का ससुराल नगर के नामी एडवोकेट पूनमचन्द खडगावत के यहां था ।

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ससुराल वालों ने भी मेघराजजी को दुबारा शादी के लिए समझाया मगर मेघराजजी ने बच्चों को ही अपना संसार माना क्योंकि संगत का असर भी होता है इनकी बैठक समाजसेवी पूर्व पार्षद भंवरलालजी स्वर्णकार ‘आर्यबन्धु” एवं इनके भाई शिवप्रतापजी के यहां आटे की चक्की पर थी । मेघराजजी ने अपने परिवार से कहा कि मैं बच्चों के सहारे ही अपनी जिन्दगी काट लूंगा, दूसरा विवाह नहीं करुंगा । मेरे बच्चे बडे हो जाएंगे इनकी शादी कर दूंगा तो मेरे घर लक्ष्मी एवं सरस्वती दोनों आ जाएंगी । मेघराजजी ने हिम्मत से काम लिया बच्चों की परवरिश हेतु राज दरबार की अपनी नौकरी छोड दी और अपने बच्चों के लालन-पालन में लग गए, बच्चों की परवरिश मामा-मामी ने भी अच्छे ढंग से की ।

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बडा बेटा हनुमान अपनी पढाई पूरी कर चुका था । पिता को एक सुयोग्य कन्या की आवश्यकता थी । वे लुहारों के मौहल्ले में आटे की चक्की पर बेठै रहते थे । आसूजी माली जिनकी साईकिलों की दूकान थी । इनकी नजर में यह जोडी जच रही थी वे गंगारामजी की सब्जी की दूकान पर भी बैठते थे । वहां गिरधारीलालजी भाटी भी शाम के समय आ जाते थे । चर्चा में जब बच्ची की सगाई की बात आई तब आसूजी ने गिरधारीजी को सुन्दर शुशील मेघराजजी का लडका था उसका नाम सुझाया । गिरधारीजी ने एक लक्ष्य बनाया उन्होंने कई दिनों तक लडके के चाल-चलन, उठ-बैठ पर ध्यान दिया । उसकी गतिविधियों की टोह ली, जब पूर्णतया आश्वस्त हो गए कि परिवार में कोई खोट नहीं है और लडका भी सुन्दर पढा-लिखा है तब उन्होंने अपनी लडकी का सम्बंध इस परिवार में तय कर दिया ।


शादी के पश्चात घर की बडी बहू बनना भाग्यशाली को नसीब होता है क्योंकि जिस घर में सासू मां का साया न हो वहां बहू की जिम्मेदारियां बढ जाती है । समाज, परिवार सभी का देखना पडता है । इस प्रकार संतोष भाटी से कच्छावा बन गई । अब संतोष कच्छावा के सामने चुनौतियों का पहाड खडा था लेकिन संतोष ने हिम्मत नहीं हारी । अपनी पढाई को जारी रखा । अपने घर के काम-काज सब निपटाकर सिलाई में डिप्लोमा फिर एस.टी.सी का प्रशिक्षण, एम.ए., बी.एड कर परिवार का सम्बल बन, अपने पांवों पर खडा रहकर पतिदेव के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर घर-परिवार, समाज, राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए अपना वर्चस्व खडा करने में सफल रही । सरकारी विध्यालय में अध्यापिका का दायित्व निभाते हुए बच्चों को मन लगाकर पढाया जिससे इनकी कक्षा का परिणाम सर्वश्रेष्ठ रहा । बच्चों को पढाने के साथ स्वयं ने अपना अध्ययन जारी रखा । अपने तीन बच्चों के लालन-पालन के साथ एम.ए. की पढाई पूरी करली और सरकारी स्कूल में अध्यापिका बन गई ।
सरकारी सेवा में कच्छावा ने सबसे ज्यादा वक्त ग्रामीण क्षेत्र में बिताया । कारण कि सृजन का सुख और अभिव्यक्ति का आनन्द इनके मन में पक कर उचित समय पर प्रस्फुटित हुआ । समाज सेवा के जज्बे से ओत-प्रोत जब इन्होंने देखा कि शिक्षा के अभाव में ग्रामीण औरतों का जीना दुस्वार हो रहा है । कई कूरीतियां इन पर हावी होती जा रही है, तब कच्छावा के निश्छल मन से रहा नहीं गया उन्होंने तय किया कि विध्यालय समय पश्चात महिलाओं को शिक्षा के प्रति जाग्रत करना होगा । धुन की पक्की कच्छावा अब नित्य प्रति स्कूल समय के बाद एक घंटा ग्रामीण महिलाओं को सिलाई एवं अक्षर ज्ञान करवाने में लगी रहती ।

आज कच्छावा वरिष्ठ अध्यापिका से सेवा निवृत हो गई । सेवा में रहते हुए अपने बच्चों का विवाह धूम-धाम से कर दिया सभी अपने-अपने परिवार के साथ आराम से रह रहे हैं । पतिदेव पहले ही सेवा निवृत हो गए । जब स्कूल में सेवा निवृति सम्मान समारोह हो रहा था तब मैं यह देखकर आश्चर्यचकित भाव-विभोर हो गया कि स्कूल में महा उत्सव का माहौल था । शाला परिवार और ग्रामीणों ने अपनी अध्यापिका के सम्मान में बढ चढकर शाला परिसर में विदाई समारोह आयोजित किया । विदाई वास्तव में विदाई होती है क्या गुरुजन, क्या ग्रामीण अपनी चहेती अध्यापिका के इस विदाई समारोह में सभी के नेत्र सजल थे ।

अब श्रीमती कच्छावा दुगूने जोश से समाज सेवा में आगे आ रही है । इससे पहले आप जब एस.टी.सी में अध्ययनरत्त थी तब आपको छात्रसंघ का अध्यक्ष नियुक्त किया गया । श्रीमती कच्छावा ने माध्यमिक शिक्षा बॉर्ड की व्यावसायिक शिक्षा परीक्षा ट?लरिंग में उत्तीर्ण की । आप महात्मा ज्योतिबा फुले माली (सैनी) समाज महिला प्रकोष्ठ की संयोजिका है । नारी सशक्तिकरण एवं जन जाग्रति हेतु बालिका शिक्षा एवं महिला शिक्षा पर आयोजित सेमिनारों में भाग लेते हुए समाज में नई चेतना का संचार किया । सेवानिवृति पश्चात इनकी साहित्य में रुचि को देखते हुए मैने इनसे विभिन्न पहलुओं पर बातचीत की तब मुझे लगा श्रीमती कच्छावा साहित्य की ओर सधे हुए कदम बढा रही है । सधे हुए कदम इसलिए कह रहा हूं, जब मैने इनसे इनकी लिखी कविता सुनी तो दंग रह गया । इनकी कविता में इतनी परिपक्वता । गजब ! यह कविता आपके पढने के लिए यहां दे रहा हूं इसका शीर्षक है “एक हुंकार ऐसी उठी” आप भी पढिए :-

एक हुंकार ऐसी उठी
कि मच गया तूफान रे
देख ताकत नारी की
खुद काम्पते भगवान रे ।
नारी सबला है उसे
अबला समझना भूल है
वह स्वयं फौलाद है
यों देखने में फूल है ।
उसमें है लावण्य, सुन्दरता
बडा ही हेज है
किंतु शक्ति भी अपरिमित
है गजब का तेज है ।
वह सभी को मात दे
मत अकडना इंसान रे
देख ताकत नारी की
खुद काम्पते भगवान रे ।
नारी के हैं रूप नाना
वही दुर्गा काली है
सिंह पर करती सवारी
वही खप्पर वाली है ।
देवताओं को बचाती
राक्षसों के वार से
कभी डरती है नहीं
वह किसी की ललकार से ।
इन्द्र भी भयभीत
इन्द्रासन भी उसका डोला
कर नहीं सकता खिलाफत
नहीं मुंह को खोलता ।
नारी से पंगा न लो
और मत बनो अंजान रे
देखकर नारी की ताकत
काम्पते भगवान रे ।
लो उठी हुंकार ऐसी
मच गया तूफान रे
देखकर नारी की ताकत
काम्पते भगवान रे ।
क्यों है ना सधी हुई कलम का कमाल । अब कच्छावा पूर्णरुप से समाज, साहित्य सेवा में लग गई है । आपकी सक्रियता को देखते हुए ज्योतिबा फुले एकता मंच बीकानेर द्वारा फुले की जयंति पर 2013 में समाज सेवा के क्षेत्र में सम्मान किया । दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका ने शिक्षक श्री अवार्ड और कर्णधार सम्मान से सम्मानित किया । अभी हाल ही में आपका सम्मान जनजीवन कल्याण सेवा समिति, समाज सेविका सरला देवी संस्थान, श्री संगीत भारती, राष्ट्रीय कवि चौपाल, अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर श्री जय भीम संस्थान नारी और नारी उत्थान सेवा समिति की तरफ से सर्व समाज प्रतिभा सम्मान से सम्मानित किया गया है ।


मैं श्रीमती संतोष कच्छावा के द्वारा किए गए रचनात्मक कार्यों का साक्षी रहा हूं । आपकी योग्यता पर मुझे गर्व है । क्योंकि मैने कच्छावा में आत्म संतुष्टि को देखा है । विपरीत परिस्थितियों में मैने इनकी सोच को परखा है “यह भी गुजर जाएगा” इस स्वीकारोक्ति के बाद मैने पाया कि इनकी भावना की उंचाई और गहराई में खुलापन है, उस खुलेपन से जो शांति निकलती है वह भौतिक नहीं वह मन की अनन्त शांति होती है ।

कच्छावा उन कर्मशील महिलाओं की प्रेरणा का स्त्रोत है जो अपने दम पर इतिहास रचने का हूनर रखती है । मन की रेल में आनन्द का सफर अगर किसी ने तय किया है तो वह सफर, मैं श्रीमती संतोष कच्छावा का मानता हूं । आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हुआ यह आशा करता हूं कि आप परिवार के साथ स्वस्थ, व्यस्त एवं मस्त रहें ।

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