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लाभकारी तकनीक  किसानों तक पहुँचाने में कृषि विज्ञान केन्द्रों की भूमिका अहम

बीकानेर । भारतीय कृषि अनुसंधान परिशद्, नई दिल्ली के जोन-ाा के कृषि विज्ञान केन्द्रों की तीन दिवसीय वार्षिक समीक्षा कार्यशाला रविवार को स्वामी केशवानन्द राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर में शुरु हुई। कार्यशाला में राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली प्रान्त के 62 कृषि विज्ञान केन्द्रों के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष और प्रसार शिक्षा निदेशक भाग ले रहे हैं। विष्वविद्यालय के मानव संसाधन विकास निदेशालय के सभागार में कुलपति प्रोफेसर बी.आर. छीपा ने कार्यशाला का उद्घाटन किया। इस अवसर पर कुलपति प्रो. बी.आर.छीपा ने कहा कि कृषि विज्ञान केन्द्र किसानों तक नवीन तकनीक पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम बना है। उन्होंने कहा कि हर बार प्रशिक्षण कार्यक्रमों में नए किसानों को जोड़ा जाना चाहिए, जिससे केन्द्र के उद्देष्यों को सभी तक पहुँचाया जा सकेगा। हमें किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलवाने के लिए फसलोत्तर तकनीक को भी अपनाने के लिए प्रेरित करना होगा। उन्होंने कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि सरल और सरस राष्ट्रभाषा में ही अपनी तकनीक पुस्तकों को जन-जन तक पहुँचाएं, इससे हमें अपने उद्देष्यों में कामयाबी मिलेगी।


कार्यशाला के आयोजक भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्- कृषि तकनीकी अनुप्रयोग संस्थान, काजरी, जोधपुर के निदेशक डॉ. एस.के. सिंह ने कहा कि कृषि विज्ञान केन्द्रों को मिशनरी भावना से किसानों और हितधारकों की सहभागिता और अभिशरण मोड पर कार्य करने की जरुरत है। हमें अपने उद्देष्यों को प्राप्त करने के लिए कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीकों को प्रथम पंक्ति प्रदर्शन कर समीक्षा करनी होती है। किसानों तक तकनीकी की ग्राह्यता, तभी होगी जब वह आर्थिक रुप से लाभकारी हो। उन्होंने कहा कि कृषि विज्ञान केन्द्र की भूमिका महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यह नये अनुसंधान और तकनीकी के परीक्षण तथा उनके प्रसार कार्यों में संबंधित विभाग एवं संस्थानों की सहयोगी संस्था के रुप में कार्य करती है। उन्होंने वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि वे किसानों की आय को दुगुना करने के लिए समेकित कृषि प्रणाली को अपनाएं क्योंकि इससे जीवन निर्वाह सुरक्षा दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि केन्द्रों को द्वितीयक कृषि के रुप में फसलोत्तर प्रबन्धन और उपज के मूल्य संवद्र्धन कार्यों को भी आगे बढ़ाना होगा। मधुमक्खी, मुर्गीपालन और बकरीपालन को भी प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। निदेशक सिंह ने बताया कि जोन-ाा में 62 कृषि विज्ञान केन्द्र शामिल हैं, जिसमें से राजस्थान में वर्तमान में 44 कृषि विज्ञान केन्द्र शामिल हैं। राजस्थान के जालौर, श्रीगंगानगर, सीकर और पाली में शीघ्र ही चार नए कृषि विज्ञान केन्द्र शुरु कर दिये जायेंगे। राज्य के 12 जिलों में दो-दो कृषि विज्ञान केन्द्र कार्यशील है। कृषि कल्याण अभियान के तहत् राज्य के जैसलमेर, फतेहपुर, सिरोही, करौली और बारां जिलों के कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा 1 जून से 31 जुलाई, 2018 तक 10 सूत्री विशेष अभियान चलाकर पौधारोपण, टीकाकरण, पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान सहित अन्य योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2017-2020 तक के अवधि के लिए कृषि विज्ञान केन्द्रों के सुदृढ़ीकरण और संस्थापन कार्यों के लिये 2840 करोड़ रुपये स्वीकृत किये हैं।


कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान संस्थान, अजमेर के निदेशक डॉ. गोपाल लाल ने कहा कि राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के क्षेत्र में बीजीय मसालों के उत्पादन की विपुल संभावनाएं हैं। जीरा, अजवायन, कलौंजी, मैथी जैसी नकदी फसलों के प्रथम पंक्ति प्रदर्शन लेने चाहिए। किसानों के लिए बदलती जलवायु परिस्थितियों में नकदी फसलें सरलता से कम लागत और मेहनत में लाभकारी उपजें हैं। कार्यशाला के द्वितीय तकनीकी सत्र में भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर के निदेशक डॉ. एन.पी. सिंह ने दलहनी फसलों पर होने वाले अनुसंधान को किसानों तक ले जाने व इसका क्षेत्रफल व उत्पादन बढ़ाने पर बल दिया। अतिथियों ने विभिन्न कृषि विज्ञान केन्द्रों और विष्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों, पशुपालकों के हित में प्रकाशित 22 कृषि तकनीकी पुस्तिकाओं/फोल्डर्स का विमोचन किया। कार्यशाला के संयोजक स्वामी केशवानन्द राजस्थान कृषि विष्वविद्यालय, बीकानेर के प्रसार शिक्षा निदेशक प्रो. एस.के. शर्मा ने स्वागत उद्बोधन में बताया कि कार्यशाला में लगभग 70 प्रमुख वैज्ञानिक और विष्वविद्यालयों के अधिकारी भाग ले रहे हैं। उन्होंने बताया कि तीन दिवसीय कार्यशाला के दौरान छ: तकनीकी सत्रों में राजस्थान, हरियाणा एवं दिल्ली राज्यों के 62 कृषि विज्ञान केन्द्रों के वरिष्ठ वैज्ञानिक अपने केन्द्रों के वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत करेंगे तथा इन प्रतिवेदनों पर समीक्षा की जायेगी। इस कार्यशाला में केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर के निदेशक डॉ. अरुण कुमार तोमर, विभिन्न विष्वविद्यालयों के प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. जी.एस. बांगड़वा, डॉ. जी.सी तिवारी, डॉ. आर.एस. हुड्डा और डॉ. के.एम. गौतम भी भाग ले रहे हैं। प्रसार शिक्षा उपनिदेशक प्रो. सुभाष चन्द्र ने समस्त उपस्थित वैज्ञानिकों का धन्यवाद ज्ञापित किया तथा कार्यक्रम का संचालन प्रो. चित्रा हेनरी ने किया।