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धन्य हुए भक्त, चातुर्मास हेतु आचार्य श्री पधारे नगर

प्रवेश शोभायात्रा में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़।

कोलकाता। जैन श्वेतांबर समाज के आचार्य श्री जिनपीयूषसागर सूरीश्वरजी महाराज आदि साधुवृन्द का रविवार को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता नगर में चातुर्मास के लिए प्रवेश हुआ। आचार्य की अगवानी समाज के लोगों ने जैन श्वेताम्बर पंचायती मंदिर कॉटन स्ट्रीट से की। समाज सहित गणमान्य नागरिक भी अगवानी में शामिल हुए।


चातुर्मास प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष अजयचंद बोथरा ने बताया कि कोलकाता नगर में ढोल नगाड़ों संग अगुवाई करते श्वेत अश्व, श्रीफल के साथ मंगल कलश लिए महिलाएं, भक्ति की रसधारा बिखेरते बैंडबाजों संग चलती आकर्षक झांकियां। और पीछे भगवान के जयकारे लगाते व नाचते झूमते श्रद्धालुओं संग नगर प्रवेश करते आचार्य भगवन्त आचार्य श्री जिनपीयूषसागर सूरीश्वरजी महाराज। भक्ति भाव से परिपूर्ण कुछ ऐसा ही दृष्य था जनकल्याणकारी चातुर्मास आयोजन के लिए श्रमणवृन्द के साथ नगर प्रवेश करते आचार्य का। जिसमें राजस्थान, झारखंड, छतीसगढ़, बिहार आदि प्रांतों के हजारों श्रद्धालुओं ने उत्साह व उमंग के साथ भाग लिया।

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आचार्य भगवंत की अगवानी समाज जनों ने अपने-अपने घरों में गवली साथियां बना कर की। भजनों पर पुरुष व युवा नृत्य करते चल रहे थे। नगर वासियों ने आचार्य भगवंत का जगह-जगह गवली बनाकर एवं स्वागत द्वार लगाकर अगवानी की। नगर प्रवेश की शोभायात्रा जैन श्वेताम्बर पंचायती मंदिर कॉटन स्ट्रीट से प्रारम्भ होकर नगर के प्रमुख मार्गों से होता हुआ जैन दादावाड़ी बद्रीदास टेम्पल स्ट्रीट मानिकतल्ला पहुंची। नगर के इतिहास में यह पहली बार है जब यहां पर खरतरगच्छ समुदाय के आचार्य भगवंत का चातुर्मास होगा। दादावाड़ी में पहुंच कर शोभायात्रा अभिनन्दन सभा में परिवर्तित हुई। जैन समाज की सभी सहयोगी महिला, पुरुष एवं युवा संगठनों द्वारा भजनों एवं संबोधनों के माध्यम से चार महीने का सानिध्य नगर निवासियों को प्रदान करने के लिए पधारे गुरु महाराज का स्वागत किया गया।

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आचार्य भगवंत की अमृतवाणी- आचार्य श्री जिनपीयूषसागर सूरीश्वरजी महाराज ने कोलकाता के गौरवशाली इतिहास का वर्णन करते हुए सभी श्रद्धालुओं से चार माह के समय में जप-तप, सत्संग, स्वाध्याय, साधना के द्वारा अधिक अधिक धर्मलाभ उठाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि बरसात के दो महीनों के बिना जिस तरह मौसम चक्र अधूरा है, उसी प्रकार चातुर्मास काल के बिना धर्माराधना अधूरी है। दशवैकालिक के प्रथम अध्याय में कहा है कि अहिंसा, संयम, तप से युक्त धर्म ही उत्कृष्ट मंगल है। ऐसे धर्म से जिसका ह्दय परिपूर्ण है उसे देवता भी नमस्कार करते है। चातुर्मास अर्थात मंगलमय अवसर। दान, शील, तप और भाव धर्म रूपी बीज को ह्दय रूपी खेत में वपन करने का गुंजन समय। बारह महीनों में चार माह धर्म आराधना के है, साधना का है, धर्म में प्रवेश करने के है।

आज तक हमने कितनी जगह में प्रवेश किया। मनुष्य जन्म पाने के बाद हॉस्पीटल में प्रवेश, नर्सरी में प्रवेश, स्कूल में प्रवेश, कॉलेज में प्रवेश, बिजनेश में प्रवेश, नये घर में प्रवेश, एयरपॉर्ट मेें प्रवेश, टॉकिज में प्रवेश, होटल में प्रवेश, मंदिर और उपाश्रय में भी प्रवेश, संयम जीवन में प्रवेश। ऐसे तो प्रवेश की बहुत लम्बी लाईन है। आज तक हमने कितनी जगहों में प्रवेश किया है ओर निकल गए किंतु हमें अब ऐसा प्रवेश करना है कि नया-नया वेश न लेना पड़ें। प्रवेश का प्र कह रहा है कि प्रमाद को छोड़कर प्रार्थना, प्रवचन, प्रतिक्रमण, प्रभूपूजा व प्रभावना में रोज आना है, प्रवेश का वे कह रहा है कि वैर-विरोध को छोड़कर शांतभाव से, प्रेमभाव से, मैत्रीभाव से जुडऩा है।

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तीसरा शब्द स कहा रहा है कि शांति, समता को धारण करके सामायिक की आराधना और जप-तप की साधना करनी है। चार गति, चार कषाय, चार संज्ञा, चार विकथा इन सबसे ऊंचा उठकर पंचम गति को प्राप्त करने के लिए चार धर्म, चार भावना, चार शरणा स्वीकार करना है। कोलकाता का शाब्दिक अर्थ बताते हुए आचार्य प्रवर ने कहा कि कोलकाता वासियों को हमने कोल अर्थात वचन दिया चातुर्मास करने का का अर्थात अब सबको कारगर बनना है और ता अर्थात तामसिक वृतियों का त्याग कर प्रेम से एकजुट होकर आध्यात्म के क्षेत्र में आप सभी आगे बढ़े।