Bikaner Rajasthan Slider

साधु का त्याग दुनिया के सारे पदार्थो से महान : प.पू. मनितप्रभसागर

बाड़मेर। (केवलचन्द छाजेड़) परम पूज्य मोकलसर नंदन मुनि श्री मनितप्रभसागरजी म.सा. ने कोटडिय़ा – नाहटा ग्राउण्ड में विराजमान विशाल जनसमुह को संबोधित करते हुए कहा सांसरिक मोहमाया, प्रपंचो से, सांसरिक संबधो से तथा संसार में सतत गतिमान पाप प्रवृतियों से परे हटकर आध्यात्मिक जीवन यापन करने वाले श्रमण कहलाते है। एक ऐसा श्वेत वस्त्र जिस पर किसी प्रकार का दाग न हो, ऐसा वस्त्र धारण करना सबको गम्य होता है ठीक वैसे ही श्रमण भी श्वेत वस्त्र की भँाति जीवन जीते है। यदी इसमे किसी प्रकार का पाप-दोष लगा हो तो तुरन्त प्रायश्चित के माध्यम से, प्रतिक्रमण द्वारा इन पापों की आलोचना करते है।


पूज्य मुनि भगवंत ने श्रमण जीवन की 5 समितियों के अन्तर्गत ऐक्षणा समिति की व्याख्या करते हुए कहा- ऐषणा अर्थात् माँगना। जो पदार्थ सहजतया, कल्पनीय, शुद्ध, प्रासुक, ऐषणीय हो उसे ग्रहण करना और ग्रहण भी तब करना जब उस पदार्थ की जरूरत हो। बिना किसी जरूरत के साधु कभी भी पद्धाथों का परिग्रह नहीं करते। शास्त्रों में दो तरह की वस्तुओं का उल्लेख आता है – पडिहारी और अपरिहारी। पडिहारी वह जिसे लेने के पश्चात् उपयोग कर लिया जाता है और वापस नहीं दे सकते जैसे – रोटी-सब्जी आदि खाध पदार्थ अपडिहारी वह जिसे लेने के बाद उपयोग करके वापस दिया जा सकता है जैसे -सुई, नेलकटर इत्यादी।


साधु भगवंत धर-धर जाकर प्रत्येक वस्तु की गवेषणा करते है। गवेषणा शब्द दो शब्दों गो $ऐषणा से मिलकर बना है जिसका अर्थ है अच्छी तरह से ढूँढना। आहार-पानी ग्रहण करने के संबध में साधु को गाय की भाँति आचरण करने का विधान बताया गया है। जिस प्रकार गाय जगह-जगह से थोड़ा-थोड़ा ग्रहण करती है और घास आदि खाध पद्धार्थों को खाने के पश्चात् स्फृर्ति, वृद्धि को तीव्र करने वाला ऐसा दुध देती है ठीक उसी प्रकार साधु भगवंत भी अलग-अलग धरों से थोड़ा-थोड़ा आहार लेते है और हम जैसे अबोध जीवों को ज्ञान, स्वाध्याय, संयम का दान देते है इसलिए साधु भगवंत के आहार करने की विधि को गोचरी कहा जाता है। पूज्य मुनि भगवंत ने श्रावकों की कत्र्तव्यपरायणता का वर्णन करते हुए कहा- हमारे जिनशासन में सिंह की भाँति ज्ञान, ध्यान, स्वाध्याय मेें पराक्रम करने वाले श्रावक चाहिए सियारों की भीड़ नही। श्रावक वे है जो धर्म को न केवल सुनते है अपितु उस अनुसार आचरण भी करते है। साधु-साध्वी भगवंतो के प्रति उनका व्यवहार कैसा हो? आहार वोहराने की क्या कला हो? जैसे विभन्न विषयों को समझाते हुए पूजा मुनि श्री ने कहा-वर्तमान की स्थिति अत्यन्त विकट है।

साधु-साघ्वी जब श्रावकों के घर गोचरी लेने हेतु जाते है तो अलग-अलग अकल्पनीय पद्धार्थों को पाते है – जों साधु साध्वी भगवंतों को नहीं कल्पता वो श्रांवको को कैसे कल्पनीय हो सकता है? हमें आवश्यकता है प्रभु वीर की सिद्धातों के समझने, उस पर चिंतन करने और अपने आचरण में लाने की। तभी हम जब से जैन और जैन से जिन की और अपने जीवन को गति प्रदान कर संकेगे।साधु को कमाई, दर्जी, सुनार, लुहार की जरूरत नहीं होती। उसका त्याग दुनिया के सारे पदार्थों से महान् है।(PB)