Article Slider

रक्षाबंधन : अतीत से जुड़े रहने का सुखद अहसास

रक्षाबंधन : अतीत से जुड़े रहने का सुखद अहसास भारतीय परंपरा एवं जीवनशैली में विश्वास ही मूल बंधन है। ‘सर्वेः भवन्तुः सुखिनः’ का उद्घोष करने वाली त्योहारों की परंपरा राष्ट्र को गौरवान्वित करती है। रक्षाबंधन के त्योहार में राष्ट्र की सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति एवं अतीत से जुड़े रहने का सुखद अहसास है। राष्ट्र की गंगा-जमुनी तहजीब के सच्चे स्मारक हमारे त्योहार ही हैं। रक्षाबंधन का त्योहार इसी परंपरा का निर्वहन करता है। रक्षा-सूत्र का कलाईपर बंधना सिर्फ रक्षा का वचन ही नहीं, अपितु प्रेम, संपूर्ण निष्ठा व संकल्प के द्वारा हृदय को बांधने का एक अद्भुत प्रयास है। गीता में कृष्ण ने कहा है- ‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणि गणा इव’ अर्थात सूत्र अविच्छिनता का प्रतीक है।
यह त्योहार भारतीय परंपराओं, ऐतिहासिक प्रतिपादनों, सामाजिक समरसता, पौराणिक आख्यानों एवं भारत के एकनिष्ठ राष्ट्र की परिकल्पनाओं को प्रतिपादित करता है। पौराणिक संस्मरणों में राजा बली द्वारा 100 यज्ञ पूरे करने के पश्चात स्वर्ग को हथियाने की लालसा को जब विष्णु रूप वामन भगवान ने विफल कर दिया एवं 3 पग में पूरे ब्रह्मांड को नापकर राजा बली को रसातल में भेजकर स्वयं हमेशा उनके साथ रहने के लिए चले गए तब लक्ष्मीजी ने राजा बली को भाई बनाकर रक्षा-सूत्र बांधा एवं उपहारस्वरूप अपने पति को वापस पाया। तब से ही हर ब्राह्मण यह श्लोक कहकर यजमान को संकल्पित करता है-
‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चलस।’
अर्थ यह है कि रक्षा-सूत्र बांधते समय ब्राह्मण या पुरोहित अपने यजमान को कहता है कि जिस रक्षा-सूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बली धर्म के बंधन में बांधे गए थे अर्थात धर्म में प्रयुक्त किए गए थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं। इसके बाद पुरोहित रक्षा-सूत्र से कहता है कि ‘हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना।’
जब द्रौपदी ने कृष्ण की कलाई में से रक्त बहते देख अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर बांधा तब कृष्ण और द्रौपदी का भाई-बहन का उत्कृष्ट संबंध बना। ऐतिहासिक रूप से राजा पुरू एवं सिकंदर महान की पत्नी का भाई-बहन का पावन रिश्ता जिसके कारण पुरू ने सिकंदर को कई बार जीवनदान दिया। कर्णावती का अपने भाई हुमांयू को रक्षा-सूत्र भेजकर अपनी अस्मिता का वचन लेना भी इतिहास-प्रसिद्ध है। यद्यपि हुमांयू के समय पर न पहुंचने के कारण कर्णावती को जौहर करना पड़ा था जिसका पश्चाताप हुमांयू को हमेशा रहा था।
ये सभी रिश्ते मानव संबंधों की बुनियाद हैं जिनसे सबक लेकर हम अपने संस्कारों को परिमार्जित कर सकते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जन-जागरण में रक्षाबंधन के पर्व का सहारा लिया गया। 1905 में लॉर्ड कर्जन ने बंग-भंग करके वन्देमातरम् आंदोलन को शोलों में बदल दिया।
 लॉर्ड कर्जन का विरोध करते हुए रवीन्द्रनाथ टैगोर लोगों के साथ यह कहते सड़कों पर उतरे थे-
‘सप्त कोटि लोकेर करुण क्रन्दन, सुनेना सुनिल कर्ज़न दुर्जन; 
ताइ निते प्रतिशोध मनेर मतन करिल, आमि स्वजने राखी बंधन।’ 
उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत में यह पर्व अलग नाम एवं अलग-अलग पद्धतियों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में ‘श्रावणी’ नाम से प्रसिद्ध यह पर्व ब्राह्मणों का सर्वोपरि त्योहार है। यजमानों को यज्ञोपवीत एवं रक्षा-सूत्र देकर दक्षिणा प्राप्त की जाती है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर समुद्र के स्वामी वरुण देवता को प्रसन्न करने के लिए नारियल अर्पित करने की परंपरा भी है। दक्षिण भारतीय ब्राह्मण इस पर्व को अवनि अवित्तम कहते हैं। यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मण स्नान करने के बाद ऋषियों का तर्पण कर नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं। महाकोशल क्षेत्र विशेषकर नरसिंहपुर एवं गाडरवाड़ा परिक्षेत्र बुंदेलखंड एवं गोंडवाना संस्कृतियों का अद्भुत संगम क्षेत्र है। यहां की सभ्यता एवं बोली पर इन दोनों संस्कृतियों का प्रभाव है।
रक्षाबंधन पर्व कजलियों के बिना अधूरा है। श्रावण शुक्ल नवमी के दिन लोग बांस की टोकरियों या पत्तों के बड़े दोनों में गेहूं बोते हैं। भाद्रपद कृष्ण प्रथम के दिन इन अंकुरित कजलियों को, जिन्हें आंचलिक भाषा में ‘भुजरियां’ कहते हैं, अपने ईष्टदेव को समर्पित करके नदी में विसर्जित करते हैं एवं विसर्जन के पश्चात थोड़ी कजलियां घर लेकर आते हैं। शाम को सब समूह बनाकर अपने ईष्ट मित्रों के घर-घर जाकर भुजरियों का आदान-प्रदान करके बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं। जिस घर में उस वर्ष कोई मृत्यु हुई हो, उस घर में जाकर लोग कजलियों के आदान-प्रदान द्वारा सांत्वना देते हैं। उस दुखी परिवार को गहन दुःख से निकालने की एक अद्भुत परंपरा एवं सामाजिक सौहार्द से जुड़ी ये प्रथा निश्चित ही अनुकरणीय है। रक्षाबंधन के पर्व को किसी जाति, धर्म या परंपरा से जोड़ना उसके निहित अर्थों को लघुता प्रदान करना है। यह पर्व मानव से मानव एवं मानव से प्रकृति के संबंधों को उच्चता प्रदान करने वाला है। राष्ट्रीय अस्मिता को पहचान देने वाला एवं भाषायी एवं क्षेत्रीय सीमाओं को लांघकर परस्पर स्नेह के बंधनों को बांधने वाला त्योहार है।
कलाई पर बंधा हुआ सूत्र एक बहन के विश्वास एवं भाई के संकल्प का प्रतिरूप है। हमारी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय अस्मिता को एक सूत्र में पिरोने का अवसर यह त्योहार है। इस पर्व में समता, ममता व समरसता रची बसी है, जो कि हमारे जीवन का मूल आधार है एवं हमारे राष्ट्र के अविच्छिन्न होने के संकल्प को प्रतिपादित करता है।
‘अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं, सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्। 
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं, स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत्।।’

4 thoughts on “रक्षाबंधन : अतीत से जुड़े रहने का सुखद अहसास

  1. 埋線雙眼皮手術、雙眼皮手術、訂書針雙眼皮、上眼皮手術、雙眼皮成形術、縫雙眼皮等一些相關、似是而非或有爭議的事項的披露與討論。

  2. 【美妆】Physicians Formula,健康彩妆品牌,让你打造出完美无瑕的自然妆容 💗 @ 潮流、美妝、消費 創造個人化風格的女性社群 PIXstyleMe 【美妆】Physicians Formula,健康彩妆品牌,让你打造出完美无瑕的自然妆容 💗

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *