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ज्ञानवती निर्ग्रंथी थी साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा – आचार्य महाश्रमण

धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा- व्यक्ति को इहलोक, इस जीवन के लिए और अगले जीवन परलोक के हित के लिए बहुश्रुत की पर्युपासना करनी चाहिए। बहुश्रुत ज्ञानी व शास्त्रों के ज्ञाता होते हैं। उनकी सेवा कर उनके बताए गए मार्ग पर चलने से व्यक्ति सुगति की दिशा में आगे बढ़ सकता है। संयमी होना और फिर साथ में बहुश्रुत भी होना बड़ी बात होती है। ऐसे तो सभी में कुछ ना कुछ ज्ञान होता है परंतु विशिष्ट व्यक्ति की बात और विशिष्ट हो जाती है। हमारे धर्म संघ में सप्त सदस्यीय बहुश्रुत परिषद है। अब उसमें छह ही अवशिष्ट रहे हैं। महाश्रमणी कनकप्रभा जी उसकी पदेन सदस्या थी। उनका अपना ज्ञान व वैदुष्य था। तत्वज्ञान, आगम शास्त्रों का उन्होंने संपादन कार्य भी किया।

आचार्यवर ने आगे कहा कि पिछले कुछ दिनों से साध्वीप्रमुखा जी के जीवन व मृत्यु के मध्य मानों संघर्ष चल रहा था। कल फाल्गुन शुक्ला चतुर्दशी, होली के दिन उन्होंने हमसे विदा ले ली। वे शासनमाता सम्मान से महिमामंडित थी। जीवन के नवमें दशक में उनके संयम पर्याय का सातवां दशक चल रहा था। गुरुदेव श्री तुलसी का उन्हें दीर्घ सान्निध्य प्राप्त हुआ, उनकी सन्निधि में उनको ज्ञानार्जन का भी मौका मिला। संस्कृत, हिंदी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ थी और कितना ही लेखन कार्य, साहित्य का कार्य उन्होंने किया। साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा एक ज्ञानवती निर्ग्रन्थी थी। गुरुदेव श्री तुलसी और फिर हमारे साथ वें पूरी दीर्घ यात्रा में भी साथ रही। मानों दिल्ली से प्रारंभ हुई इस अहिंसा यात्रा में पुनः दिल्ली पहुंच कर उन्होंने हमसे विदा ले ली। उनकी आत्मा परम की दिशा में आगे बढ़ें, उनसे औरों को भी बहुश्रुत बनने की प्रेरणा मिलती रहे मंगलकामना।

तत्पश्चात कार्यक्रम में मुनि ऋषभ कुमार, मुनि नय कुमार, मुनि गौरव कुमार, मुनि हितेंद्र कुमार, मुनि शुभंकर कुमार ने अपने विचारों की प्रस्तुति दी। मंच संचालन मुनि दिनेश कुमार ने किया।

इसी क्रम में साध्वी श्री शीलप्रभा, साध्वी श्री कीर्तिप्रभा, साध्वी श्री प्रबुद्धयशा, साध्वी श्री कमनीयप्रभा, साध्वी श्री सार्थकप्रभा, समणी सत्यप्रज्ञा, समणी रोहिणीप्रज्ञा एवं तेरापंथी महासभा के पूर्व अध्यक्ष श्री किशनलाल डागलिया, श्री धनराज बैद, श्री पूनमचंद छाजेड़, श्री आरती जैन ने प्रस्तुति दी। श्री संजय भानावत व श्रीमती वनिता भानावत ने गीत का संगान किया।

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