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अनासक्ति और नम्रता जीवन को उन्नतिशील बनाते है- विजयराज जी म.सा.


_क्रोध पर विजय पाने के लिए संयम का मार्ग
बीकानेर। जब तक व्यवहार में नम्रता नहीं आती, तब तक हम संयम के सर्वोच्च शिखर पर नहीं पहुंच सकते। नम्रता कब आती है…?, जब हमारा अहंकार टूटता है। हम सब हमारे जीवन में उन्नति चाहते हैं, उत्थान चाहते हैं। यह ज्ञान दर्शन श्री शान्त क्रान्ति जैन श्रावक संघ के  1008 आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने श्रावक-श्राविकाओं को जिनवाणी के द्वारा करवाए। महाराज साहब सेठ धनराज ढ़ढ्ढा की कोटड़ी में मंंगलवार को नित्य प्रवचन के दौरान साता वेदनीय कर्म के सातवें बोल ‘संयम का पालन करता जीव साता वेदनीय का उपार्जन करता है’ के तीसरे बंध व्यवहार में नम्रता विषय पर अपना व्याख्यान दे रहे थे। आचार्य श्री ने बताया कि महापुरुष फरमाते हैं, अनासक्ति और नम्रता जीवन को उन्नतिशील बनाते हैं। लेकिन मैं देखता हूं कि लोगों में व्यवहारशीलता नहीं है,लोगों में अक्खड़पन दिखाई देता है। जितने भी महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने संयम के शिखर को छुआ, उन्होंने व्यवहार में नम्रता लाई है। आपने भी यह सु1ित पढ़ी होगी ‘विद्या ददाति विनयम्, विनयात् ददाति पात्रता’। व्यक्ति में अगर पात्रता आ जाए तो उसे वह उन्नतिशील बनाती है। अगर हम अपना कल्याण  चाहते हैं, उत्थान चाहते हैं, उन्नति करना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने व्यवहार में नम्रता लानी होगी। महाराज साहब ने कहा कि आप संसारी लोग ना जाने किस बात का अहंकार करते हैं, अगर आपके व्यवहार में अहंकार है तो आप संयमी नहीं बन सकते।
 _पॉजिटिविटी ही पुण्य
आचार्य श्री ने कहा कि पॉजिटिविटी धर्म है, पुण्य है, सत्य है, सत्कर्म है और मोक्ष का साधन भी है। लेकिन हम क्या करते हैं..?, हम लोग नेगेटिविटी में जीते हैं। जबकि संयम के बगैर सुख नहीं मिलता, समाधी नहीं मिलती, संतुष्टि नहीं मिलती है। सच्चे साधक क्या करते हैं, हाथ जोडक़र जीते हैं और हम क्या करते हैं, हाथ दिखाकर जीते हैं। आचार्य श्री ने कहा बंधुओ, यह सही नहीं है, अच्छा नहीं है।
क्रोध पर नियंत्रण जरूरी
आचार्य श्री विजयराज जी महाराज साहब ने क्रोध पर विजय पाने के लिए संयम का मार्ग अपनाना ही पड़ता है। जो क्रोध पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता, उसे अवधीज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है। जितनी सहनशीलता आपके जीवन में बढ़ेगी, आपमें नम्रता आएगी। व्यवहार में विनम्रता, शालीनता, शिष्टता हो तो क्रोध से आप रहित रहते हैं, क्रोध से रहित रहने वालों को ही संयम की प्राप्ति होती है। अगर यह सब गुण आपमें नहीं हैं तो आपमें क्रोध बना रहता है, वह संयम श्रेष्ठ नहीं बनता। महाराज साहब ने कहा कि संसार में कोई श्रेष्ठ है तो वह व्यवहार संयम ही है। इसके अलावा ना पैसा श्रेष्ठ है, ना पद श्रेष्ठ है। इसलिए व्यवहार में नम्रता लाएं। इस बात को समझाने के लिए महाराज साहब ने तपस्वी और एक सेठानी व कुम्भार का प्रसंग बताया और कहा कि सेठानी ने कैसे क्रोध को नियंत्रित कर अवधी ज्ञान की प्राप्ति की थी।
_सुख आते हैं, दुख जाते हैं
आचार्य श्री ने प्रेरक भजन ‘सुख आते हैं, दुख जाते हैं, दुख जाते हैं, सुख आते हैं, इन आते – जाते, सुख- दुख में हम मस्त रहते हैं, हम मस्त रहते हैं। सुनाकर कहा कि साधक की पहचान हर हाल में मस्त रहने, समभाव रहने से होती है। संतो के मस्त रहने का एक ही कारण है कि हम मस्ती बांटते हैं। लेकिन आप बांटने में नहीं, बटोरने में लगे रहते हो, बंधुओ, बटोरने से सुख नहीं मिलता। सुख तो बांटने से मिलता है। आपके पास सुख है और आप उसे बांटते हो तो आप किसी का  दुख घटाते हैं। जब दूसरों के दुख घटाकर उन्हें सुख प्रदान करते हैं तो हमें भी सुख साता की प्राप्ति होती है।
_गृहस्थ जीवन में पुण्य जरूरी
महाराज साहब ने फरमाया कि अगर आपके जीवन में पुण्य नहीं है तो आपको बहुत तकलीफें हैं। पुण्य का सहयोग है तो आप सुखपूर्वक रहते हैं। रोग, शोक, भय, चिंता यह सब पुण्य प्रबल होने पर आपके साइड से निकल जाते हैं। इसलिए रोजाना तप करो, कुछ ना कुछ दान करो, त्याग करो। त्याग करने से ही पुण्य बढ़ता है। राग मत करो, यह हमारे पुण्य को घटाते हैं। यह याद रखो जीवन को पुण्य चलाता है। आचार्य श्री के प्रिय भजन – आत्म चिंतन, आत्म मंथन और आत्म मनन करने वाला ‘उम्र थोड़ी सी हमको मिली थी मगर, वो भी घटने लगी देखते-देखते’ का सामूहिक संगान श्रावक-श्राविकाओं, संत- महासती ने किया।
_ मन्दसौर, चित्तोड़ संघ का स्वागत किया
श्री शान्त क्रान्ति जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष विजयकुमार लोढ़ा ने बताया कि मंगलवार को मन्दसौर, चित्तोड़ से पहुंचे, जिनका संघ की ओर से स्वागत किया गया। उन्होंने महाराज साहब के दर्शनलाभ लिए और उनके श्रीमुख से जिनवाणी का श्रवण भी किया।
विजयकुमार लोढ़ा ने बताया कि संघ के श्रावक-श्राविकाओं की तपस्या के दौर जारी हैं। श्रावक-श्राविकाओं ने उपवास, एक, दो सहित आगे बढऩे वाले उपवास, बेला, तेला, आयम्बिल , एक पोरषी, दो पोरषी सहित कर रहे तप के पच्चक्खान आचार्य श्री से करवाए। अंत में मंगलिक सुनाकर विश्व शांति के कल्याण की कामना की गई। 

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