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अनेक विसंगतियों से भरा भारत का वित्त तंत्र-राकेश दुबे


हाल ही में हुए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि देश की बड़ी कंपनियों में से करीब एक चौथाई के पास इतनी नकदी नहीं है कि वह ३० दिन तक राजस्व के बाधित होने की भरपाई कर सके। जब-जब राजस्व में ऐसी कोई बाधा उत्पन्न हुई है तो इन कंपनियों के बचाव के लिए बाहरी पूंजी इस्तेमाल किया गया है |कोविड-१९ जैसी प्राकृतिक आपदा में तो कई कंपनियों का काफी नुकसान हुआ है।मजबूत वित्तीय तंत्र इनमें से कुछ को जीवनदान देगा। लेकिन,वित्तीय तंत्र को यह समझना होगा कि माहौल बदल चुका है। पूंजी आवंटन के दौरान उसे ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें ही पूंजी दी जाए जिनके बचने और बेहतर प्रदर्शन करने की आशा हो। सन २०२० और २०२१ में देश की बहुत सारी कंपनियां इसकी भेंट चढ़ जाएंगी।

वित्तीय स्थिति खराब होने पर एक फार्मूले का इस्तेमाल किया जाता है। खराब स्थिति वाली कंपनियों को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है| पहली वे जो किसी सूरत में कामयाब नहीं हो सकतीं, दूसरी वे जो बस ठीकठाक रह सकती हैं और तीसरी वे जिनकी मदद से बड़ा अंतर पैदा किया जा सकता है। यह वर्गीकरण इस बात में मदद करता है कि उन जगहों को लाभान्वित किया जाए जहां सबसे अधिक सुधार होने की संभावना हो।वैसे यह निहायत क्रूरतापूर्ण है।
अब पूंजी को उन स्थानों पर आवंटित करने का प्रयास होना चाहिए जहां उत्पादन सबसे अधिक प्रभावित हो। कुछ कंपनियां इस स्थिति में नहीं होंगी और उनमें पैसे लगाने का अर्थ होगा फंसी हुई पूंजी को बचाने की कोशिश में नई पूंजी फंसाना। कुछ कंपनियों को ज्यादा पूंजी की आवश्यकता होगी , लेकिन उतनी नहीं कि वे उच्च प्रतिफल दे सकें। यह मध्यम क्षेत्र है जहां कंपनियों के लिए अपना बचाव और सफलता दोनों सामने आ सकती हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब नई पूंजी लाई जाए।

एक सक्षम वित्तीय तंत्र को ऐसा ही करना चाहिए। किसी भी निवेशक के लिए सबसे अच्छा सौदा तभी होता है जब वह एक मजबूत फर्म में अपना पैसा लगाए। जहां यह पूंजी जीवन-मरण के बीच का अंतर पैदा करे।
किसी भी अर्थव्यवस्था में वित्तीय तंत्र की भूमिका मस्तिष्क की होती है। यह पूंजी का वैकल्पिक इस्तेमाल सुझाता है और इससे अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसी जगह पूंजी निवेश करेगा जहां सबसे अधिक प्रतिफल हासिल होगा। वित्तीय तंत्र इक्विटी और डेट पूंजी के लिए कई प्रस्तावों को ठुकराता भी है। जिन फर्म को अपना अस्तित्व बचाने के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है, उनमें इस पूंजी की जबरदस्त मांग होना स्वाभाविक है। वे कई ऋणदाताओं या इक्विटी निवेशकों के पास जाएंगे और उनसे यह बताने की कोशिश करेंगे कि कैसे उनकी फर्म को निवेश की आवश्यकता है।
एक अच्छी वित्तीय व्यवस्था वह होती है जहां सक्षम कंपनियां लगातार बाहरी पूंजी जुटाने में सक्षम हों। भारत में कुछ बड़ी कंपनियां बिना अच्छे प्रदर्शन के भी वित्तीय तंत्र में भरोसे के लायक मानी जाती हैं। उन्हें भी उनकी मर्जी से बाहरी ऋण मिल जाता है।ज्यादातर फर्म के लिए भारतीय वित्तीय तंत्र खराब ढंग से काम करता है। कई फर्म ऐसी होती हैं जिन्हें अच्छे दिनों में पूंजी मिल जाती है लेकिन बुरे समय में ऐसा होना मुश्किल होता है। ऐसे में भारत की अधिकांश कंपनियों में नकदी जमा करके रखने की प्रवृत्ति होती है। इस दुष्काल में देश के वित्तीय तंत्र में कई दिक्कतें हैं।

जब भी आर्थिक मंदी आती है और कई कर्जदार समस्या में पड़ जाते हैं तो यह बात उन बैंकों को भी प्रभावित करती है जिन्होंने उन्हें ऋण दिया हो। सन २०२० में भारतीय वित्तीय तंत्र की हालत और बुरी हो सकती है। कई बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां तनाव में और अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं।यही दिक्कतें बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की पूंजी डालने की क्षमता को प्रभावित करेंगी। पूंजी नियंत्रण, वित्तीय नियमन, कराधान और प्रवर्तन एजेंसियों के मिश्रण ने देश में विदेशी पूंजी का काम बहुत बढ़ा दिया है। इससे देश में विदेशी पूंजी तक पहुंच सीमित हुई है। कई प्रतिभूतियों के लिए वित्तीय बाजार नकदीकृत हैं और उनकी कीमतों में विसंगतियां हैं।

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