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अब यह सूरत बदलनी चाहिए ?


कवि दुष्यंत के शब्दों में- सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं , मेरी कोशिश हैं कि ये सूरत बदलनी चाहिए। वही चेहरे, वही लोग और उनकी अभद्र भाषा से जनता का मन उकता गया हैं। गत वर्षों में बड़े नेताओ द्वारा जो आरोप- प्रत्यारोप का सिलसिला चला उनके शब्दों को हमे लिखते हुवे भी शर्म आती हैं। भारत के प्रधान मंत्री श्री मोदी जी के लिए जिन शब्दों का प्रयोग हुआ। वह भारत जैसे लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं कहे जा सकते। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच के मनमुटाव को हमने देखा। निक्कमा, नाकारा, राजद्रोही जैसे प्रयोग किए गये शब्दों को जनता ने पढ़ा। राहुल के अमर्यादित भाषण को सुना। वसुन्धरा को पार्टी से किनारे होते देखा। गतिहीन विपक्ष को देखा। चुनाव निकट आते ही लोकलुभावनी घोषणाएँ सुनी। जिन राजनेताओं के लिए हम एक दूसरे से नाराज़ होते थे, बहस करते थे अब हमे उन लोगो की हक़ीक़त देख लेनी चाहिए। ना विचारधारा , ना उसूल , और ना ही ज़मीर। जिधर हरियाली और फ़ायदा दिखाई दिया उस और चल दिए। हमने फिर विरोधी नेताओ को हाथ मिलाते और एक होते देखा हैं । जनता विस्मित हुई यह क्या हों रहा हैं ? और ये लोग यह कहते रहे कि राजनीति में कोई दोस्त- दुश्मन नहीं होता। सावर्जनिक सभाओं में- विधान सभा में हम जनता को जताने के लिए एक दूसरे पर आरोप ज़रूर लगाते हैं फिर समय निकाल कर विधान सभा की केंटिंन में मिलकर एक साथ चाय पीते हैं। पब्लिक को कैसे मूर्ख बनाया जाये कोई इनसे सीखे ? कई सालो से चुनाव में उम्मीदवारों के चयन के लिए सर्वे होते हैं कई कमेटियों का गठन होता हैं। कभी यह बयान आता हैं इस बार बुढ़ो को टिकट नहीं मिलेगी। युवा और महिलाओं को तरजीह दी जायेगी। लेकिन यह सब बाते- वही ढाक के तीन पात। वही पुराने चेहरे, वही लोग- क्या करे कुर्सी इनको नहीं छोड़ती। यह सब- देख सुनकर मेरे सीने में न सही, कही तो आग लगनी चाहिए। ख़ैर एक बात स्पष्ट हैं। राजनीति में कभी अपने बाप पर भी भरोसा मत करो। इसके लिए एक उदाहरण प्रयाप्त होगा। एक रजनीतिक्ष के बेटे ने अपने बाप से कहा कि मैं भी आपकी तरह नेता बनूँगा। आपकी इतनी धन दौलत , पहुँच और लोकप्रियता देखकर, मुझे भी राजनीति में आना हैं। पहले बापू ने मना किया फिर कहा , अगर तू नहीं मानता तो आ मैं तुझे राजनीति का पहला पाठ पढ़ाता हूँ। ऐसा करो- एक निसरनी- ले आओ। फिर इस पर चढ़कर छत पर पहुँच जाओ। बेटे ने वैसा ही किया जैसा बाप ने कहा। बेटा निसरनी पर चढ़कर छत पर पहुँच गया। बापू ने निसरनी वहाँ से हटा ली। और बेटे से कहा छत से कूद जाओ। बेटे ने कहा- बापू मैं इतनी ऊँचाई से कूदूगा तो मेरी टाँगे टूट जायेगी। बापू ने कहा- चिन्ता न कर मैं हाथो में तुझे उठा लूँगा। बेटे ने वही किया जैसा बाप ने कहा। जैसे ही बेटा छत से कूदा- बाप ने अपने हाथ हटा लिए और बेटे के हाथ- पैर टूट गये। बेटे ने कहा बापू आपने हाथ क्यों हटा लिया था तब बापू ने कहा कि राजनीति में अपने बाप पर भी कभी भरोसा न करना , किसी भी रजनीतिक्षों पर विश्वास मत करना। यह राजनीति का पहला पाठ हैं। और इधर हमारी जनता हैं कि राजनेताओं की हर घोषणा को सच्च मानती हैं उन पर पूरा भरोसा करती हैं। और हर बार ठगी जाती हैं। लेकिन जनता भी क्या करे , उसके पास कोई विकल्प नहीं ?वह मजबूर और विवश हैं इधर कुआँ, उधर खाई हैं। आख़िर जाये तो कहा जाये ? फिर भी अन्तिम निर्णय का अवसर हैं इन प्रश्नों पर मनन करे। और सोचे अब हमे क्या करना हैं। उत्तर मतदाताओं के पाले में हैंअब यही से भविष्य निकलेगा। —-मनोहर चावला

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