आजकल तो जैसे-जैसे साल बदलता है वैसे-वैसे मीडिया में नए-नए फ़र्ज़ी पत्रकार आने लगते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि हर साल इन पत्रकारों की लिस्ट बदल जाती है। थोड़े समय पहले एक बार फिर फ़र्ज़ी पत्रकारों की नई लहर सी देखने को मिली। यह खबर किसी एक के बारे में नहीं है बल्कि उन सब नए फ़र्ज़ी पत्रकारों पर है जो भारत के हर कोने में अचानक कहीं से आकर खुद को पत्रकार कहने लगते हैं। आजकल घूम रहे फ़र्ज़ी पत्रकारों को लगता है कि मीडिया उनके इर्द गिर्द घूमता है। इनमें से कुछ गिफ़्ट के भूखे हैं तो कुछ ब्लैकमेल करके पैसे बनाने में व्यस्त हैं। चिंता की बात यह है कि ऐसे फ़र्ज़ी लोगों को रोकने वाला या इन्हें मीडिया में घुसने से रोकने वाला भी कोई नहीं है। कोई भी यह ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहता कि ऐसे लोग मीडिया का नाम ख़राब न कर सकें। मुफ़्त में चैनल बनाकर यह लोग खुद को किसी बड़े अख़बार या न्यूज़ चैनल का मालिक समझते हैं व सब पर धौंस जमाते घूम रहे हैं। दिक्कत ज़्यादा तब आती है जब असली पत्रकार इनका साथ देने लगते हैं या इन्हें प्रमोट करने लग जाते हैं। हर कोई इन फ़र्ज़ी पत्रकारों को पीठ पीछे बुरा-भला कहता है लेकिन सामने इन्हें बराबर की इज़्ज़त देकर बढ़ावा भी देने लगते हैं। देखा जाए तो जितना गलत यह फ़र्ज़ी पत्रकार कर रहे हैं उतना ही गलत वह लोग भी कर रहे हैं जो इन्हें मीडिया की छवि खराब करने से रोक नहीं रहे। इन फ़र्ज़ी पत्रकारों का मीडिया में आने का मकसद सिर्फ़ पावर हासिल कर लोगों को डराना-धमकाना, मीडिया का नाम गलत कामों में इस्तेमाल करना, प्रेस वार्ता में आकर खाना व गिफ़्ट बटोरना ही है। इन्हें न तो पत्रकारिता के नियम पता हैं, न ही इन्हें किसी ख़बर से कोई लेना देना है और न इन्हें किसी की भलाई के लिए काम करना है। इन्हें तो सिर्फ अपनी जेबें भरनी हैं फिर चाहे उससे असली पत्रकारों का नाम ख़राब हो या मीडिया पर दाग़ लगे। इनका फायदा होना चाहिए क्योंकि इनको लगता है इन्होंने तो मीडिया में आकर भी एहसान ही किया है। आज टुकडैल पत्रकारों की बदौलत स्वच्छ मीड़ियाकर्मी स्वंय को ठगा सा महसूस करते हैं।
इशारों इशारों में…………!राजेंद्र सोनी चंड़ीगढ़

