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एक महिला किसी और की तरफ़ से सम्मन क्यों नहीं स्वीकार कर सकती…..???


-सुप्रीम कोर्ट ने धारा 64 CrPC को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा

नई दिल्ली,(दिनेश शर्मा “अधिकारी “)। सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 64 की वैधता को इस आधार पर चुनौती देने वाली एक याचिका पर नोटिस जारी किया है कि यह महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण है क्योंकि यह धारा महिलाओं को समन किए गए व्यक्ति की ओर से समन स्वीकार करने में अक्षम पाती है।
कुश कालरा बनाम भारत संघ और अन्य मामले में याचिकाकर्ता ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (सीपीसी) में प्रावधान है कि समन किसी भी वयस्क सदस्य को उनके लिंग की परवाह किए बिना तामील किया जा सकता है, जबकि सीआरपीसी एक वयस्क महिला सदस्य को समन स्वीकार करने में सक्षम और सक्षम नहीं मानती है। याचिका में आगे कहा गया है कि इस तरह के बहिष्करण दूसरों की ओर से सम्मन प्राप्त करने से महिलाओं की संख्या भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 19 (1) के तहत गारंटीकृत अधिकार का उल्लंघन करती है।
याचिका में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि उक्त प्रावधान उन परिदृश्यों को ध्यान में रखने में विफल रहता है जहां घर में केवल एक वयस्क महिला उपलब्ध होती है। कविता बनाम यूओआई का भी संदर्भ दिया गया था जिसमें धारा 64 को चुनौती दी गई थी और जहां सरकार ने कहा था कि प्रावधान महिलाओं की गोपनीयता की रक्षा के लिए था।
CJI चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की खंडपीठ ने याचिका पर विचार किया और मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।

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