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एसएन सुब्बराव नहीं रहे। जयपुर में आज उन्होंने आख़िरी साँस ली।

ओम थांनवी की कलम से …

जयपुर।गांधीजी के वे चलते-फिरते दूत थे। गांधी-विचार को उन्होंने जिया। जीवन में उतारा। शिविर आयोजित कर दूर-दूर तक फैलाया। युवकों को प्रेरित किया। कर्नाटक से आते थे। पर उत्तम हिंदी बोलते थे। भजन गाते थे।

1970 में जौरा (मुरेना) में उन्होंने गांधी आश्रम बनाया था। चम्बल क्षेत्र में जो दस्यु-समर्पण हुआ, उनके पुनर्वास में सुब्बरावजी बहुत सक्रिय रहे। आश्रम से अनेक गांधीवादी कार्यकर्ता जुड़े रहे। उनमें पीवी राजगोपाल भी शामिल हैं।

अस्सी के दशक में जयपुर में और बाद में दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में सुब्बरावजी से कई बार मिलना हुआ। जयपुर मेरे मित्र रमाकान्त (तब प्रौढ़ शिक्षण समिति में, बाद में बैंकर), सधेंदु पटेल, चचाजान रमेश थानवी और अशोक गहलोत (अभी मुख्यमंत्री) उनके क़रीब थे।

गांधीजी अधधोती में जिए। सुब्बरावजी आधी पतलून में (ख़ाकी नहीं)। कड़ा जाड़ा हो चाहे ऊँचे पहाड़, उनका यही पहनावा रहा। नम्र आवाज़। विनम्र आचरण। दुराचार का सविनय प्रतिकार।

वे 93वें में चल रहे थे। उम्र थी, मगर सक्रिय थे।

बुरे दौर में एक सच्चा स्तम्भ हमारे बीच से और गया। उन्हें सश्रद्धा स्मृतिनमन।

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