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ऐसे होता है समाज का पतन , पुरस्कार की कितनी साख

– हेम शर्मा – ओम एक्सप्रेस

किसी समाज को गर्त में डालना होतो अच्छाई औऱ अच्छे लोगों की उपेक्षा कर दो और दो टके के लोगों का महिमा मंडन करते जाओ समाज की मानसिकता वैसी ही बनती जाएगी। समाज के आदर्श बदल जाएंगे। दलाल समाज सेवक और बिचोलिये जन प्रतिनिधि बन जाएंगे। ऐसा हो रहा है। हम खुद ऐसा ही कर रहे हैं। इसका प्रमाण 15 अगस्त को जिला प्रशासन की ओर से सम्मान किए जाने वालों की सूची से मिलता है। यह सच है कि सभी ऐसे नहीं है। जिनका सम्मानित होने पर आत्म सन्तोष हुआ है वे वाकई सम्मान के हकदार हैं। जिनको सम्मान पाकर तुष्टि हुई है ऐसे लोगों ने नेताओं की सिफारिश से, गुटबन्दी करके अथवा येनकेन पुरस्कार पाया है। वे अपन मन में जानते हैं कि वाकई वे कितने हकदार हैं। यह आलोचना का विषय नहीं है, बल्कि जिला प्रशासन को सोचने और सुधार करने का विषय है। जिन्होंने सच्ची सेवा, समर्पण और मेहनत से पुरस्कार पाया है उनकी चुंहु ओर प्रशंसा होगी ही। आलोचना करने वाले भले ही कितनी ही आलोचना करें।। बिना कुछ किए मिलने वाले पुरस्कारों की समाज में अहमियत भी कितनी है यह किसी से छिपी नहीं है। सवाल यह है कि जिम्मेदार लोगों ने पुरस्कारों को महत्वहीन बना दिया है।। एक मेरे व्यंग्यकार मित्र ने पिछले दिनों एक भाई को इंटरनेशनल अवार्ड मिलने पर व्यग्य लिखा था कि खर्चे की लागत पर पुरस्कार ले लो पुरस्कार।। खैर जो पुरस्कार जिला प्रशासन तय करें। राजस्थान सरकार के कैबिनेट मंत्री दें उनको लेना वाला सच्चा हकदार हो तो ही देने वालों की इज्ज़त हैं। नहीं तो समाज उस पुरस्कार का सम्मान कितना करेगा लेने वाला खुद महसूस कर सकता है। जिन्होंने अच्छा काम किया है उनकी तो प्रशंसा ही होगी। बाकी तो राम ही जाने।

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