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‘ओळूं री अंवेर’ के बहाने ख्यातनाम कवि मोहन आलोक के रचनाकर्म पर बात

– जै-जै राजस्थान के वर्चुअली मंच पर वेबिनार के माध्यम से मोहन आलोक को किया याद

लूणकरणसर, (ओम दैया )। लोक की गहरी समझ रखने वाले प्रयोगधर्मी कवि मोहन आलोक को भारत, लन्दन और अमेरिका से जुड़े ‘जै-जै राजस्थान’ वर्चुअली मंच द्वारा आयोजित वेबिनार ‘ओळूं री अंवेर’ में याद किया गया। कार्यक्रम में आलोक के जीवन से जुड़े विभिन्न पक्षों पर चर्चा की गई। वहीं उनके रचना संसार से लोगों को रूबरू करवाया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे बोधि प्रकाशन के ऑनर माया मृग ने कहा कि ‘उम्र भर मोहन आलोक के भीतर एक बच्चा मचलता रहा। उसी मासूमियत के साथ उनका लेखन नए कीर्तिमान गढ़ने में कामयाब रहा।,

मोहन आलोक के जीवन और लेखन के हमराज रहे वरिष्ठ पत्रकार डॉ.हरिमोहन सारस्वत ने उनसे जुड़े किस्से सुनाते हुए कहा कि ‘राजस्थानी में ‘डांखळा’ और ‘सॉनेट’ उनकी ही देन है, जिसके लिए राजस्थानी साहित्य का प्रत्येक पाठक उनका ऋणी रहेगा।’
साहित्य से इतर उनके पर्यावरण प्रेम को उजागर करते हुए युवा कवि राजूराम बिजारणियां ने कहा कि ‘आलोक हरे मन के हरियल आदमी थे। जो प्रकृति और मानव से बराबर स्नेह करना और ख़्वाब बुनना जानते थे।’
साहित्यकार मदनगोपाल लढ़ा ने आलोक की रचनाओं का पाठ करते हुए उनकी रचनाओं को सहजता से पाठक को बांधकर रखने वाली बताया।
वेबिनार का संचालन कर रहे छैलदान चारण ‘छैल’ ने कार्यक्रम के बीच-बीच में मोहन आलोक की रचनाओं का सस्वर वाचन किया। इस दौरान लन्दन से जै-जै राजस्थान के हनुवंत सिंह राजपुरोहित पूरे कार्यक्रम के दौरान साथ में बने रहे।

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