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कांग्रेस मंत्रियों की आपसी लड़ाई में दबने लगा मासूमों की मौत का मामला!

– मारवाड़ और हाड़ौती क्षेत्र में कुपोषण ही नवजात मौत की सबसे बड़ी वजह
जयपुर। मारवाड़ और हाड़ौती क्षेत्र में नवजात बच्चों की मौत का डरा देने वाले आकड़े और समाचार सामने आ रहे हैं। हर रोज माताओं की गोद सूनी हो रही है और सरकार के मंत्री एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी कर मामले में ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं। मीडिया में भी मंत्रियों की आपसी बयानबाजी को प्रमुखता से स्थान मिल रहा है जबकि मौत के समाचार अब ज्यादा छोटे हो गये हैं।
कोटा के जेके लोन अस्पताल में हर रोज बच्चों की मौत हो रही है। उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट और चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा भी दौरा कर आये किंतु बच्चों की मौत का सिलसिला कम नहीं हो रहा है। अस्पताल में मौजूदा व्यवस्थाओं की पौल खुल रही है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृहनगर जोधपुर ओर बीकानेर से भी इसी तरह के समाचार आ रहे हैं।

राजस्थान के हाड़ौती और मारवाड़ क्षेत्र में कुपोषण की बात को भले ही सरकार स्वीकार नहीं करे किंतु सच यह है कि महिलाओं का औसतन वजन 40 किलो से कम रहता है। उनको देखने मात्र से अहसास हो जाता है कि महिलाओं को पोषित भोजन नहीं मिलता है और जब यही महिलाएं गर्भवती होकर प्रसव में शिशु को जन्म देती हैं तो वह बच्चा भी सामान्य वजन का नहीं हो पाता। वह भी कुपोषण का शिकार हो जाता है।
हाड़ौती क्षेत्र से वसुंधरा राजे 10 साल तक मुख्यमंत्री रही हैं और मारवाड़ क्षेत्र से अशोक गहलोत तीसरी बार सीएम बने हैं। इन दोनों नेताओं को अपने क्षेत्र की महिलाओं के कुपोषित होने की जानकारी नहीं हो, यह संभव नहीं लगता है।

महिलाओं को कुपोषण से बचाने के लिए कागजों में सरकारी मशीनरी कई योजनाएं चला रही हैं। इनमें आंगनबाड़ी केन्द्रों पर चावल और गेहूं उपलब्ध करवाया जाना भी शामिल है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर विटामिन, कैल्शियम की गोलियां भी खिलायी जाती हैं ताकि गर्भ में पल रहे बच्चे कुपोषण से बच सकें।
यह योजनाएं सरकारी मशीनरी चला रही है और हर साल कई सौ करोड़ रुपये खर्च कर दिये जाते हैं इसके बावजूद कोटा संभाग और जोधपुर संभाग क्षेत्र में बाल मृत्युदर को देखा जाये तो यह डब्ल्यूएचओ के मापदण्ड से कहीं अधिक है। अब सरकार के दो मंत्री एक-दूसरे पर इशारों ही इशारों में बयानबाजी कर रहे हैं।
हकीकत तो यह होनी चाहिये थी कि सरकार को तुरंत कदम उठाते हुए मृत्यु दर की रोकथाम और कुपोषण से बालकों को बचाने के लिए घोषणा करनी चाहिये थी। अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने पीएमओ को अस्पताल में काम करवाने के आदेश दिये और बैठक समाप्त हो गयी। सरकार प्रदेश की जनता तक संदेश पहुंचाने में कामयाब नहीं हो पायी है।

गर्भवती महिलाओं को मिले पोषक तत्व
चिकित्सा मंत्री का इस्तीफा या कोटा/जोधपुर के चिकित्सा अधिकारियों का स्थानांतरण बच्चों की मौत का आकड़ा कम करने में कारगर होगा, यह स्थायी समाधान नहीं है। मंत्री का इस्तीफा राजनीतिक रूप से किसी गुट या पार्टी की जीत हो सकती है। अधिकारियों का तबादला जनता को शांत करने का एक संक्षिप्त संदेश हो सकता है किंतु यह सच है कि भविष्य में भी हमें इस तरह के समाचारों से रूबरू नहीं होना पड़ेगा, इसको स्थायी समाधान नहीं कहा सकता है। स्थायी समाधान के लिए सरकार गर्भवती महिलाओं को पोषक तत्व मिले, इसके लिए कदम उठाये। सरकारी योजनाओं की समीक्षा करे और संभव हो तो हर गर्भवती महिला के बैंक खाते में एक निश्चित राशि को ट्रांसफर किया जाये ताकि वह अपने और अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य हेतु पोषक तत्व यथा घी-दूध, अंडा आदि खरीद सके। भोजन में उसको कम से कम एक समय सलाद (खीरा आदि) मिल सके। इससे जन्म लेने वाले बच्चे का वजन औसत से अधिक होगा। अस्पतालों में अधिक संसाधन की खरीद और उसके रख-रखाव की भी जरूरत नहीं होगी। इन दोनों क्षेत्रों में मृत्यु का कारण कुपोषण अर्थात कम वजन ही है

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