– सरदार वल्लभभाई पटेल के नजरिए से वर्तमान

क्रिकेट मॅच पर पाकिस्तान समर्थन मे भारत विरोधी नारों के साथ में पटाखे-पत्थरबाजी के अर्थ ?

करण समर्थ – आयएनएन भारत मुंबई

अब बहुत हुआ, अब गंगा-जमुनी तहजीब विचारधारा गंगा मैया में विसर्जन किया जाए। क्योंकि इस भ्रमित मानसिकता से भारतीयों का कोई संबंध नहीं है, तो नेहरू गांधी की यह गलत सोच को हम आज क्यों ढोते रहें। सरदार वल्लभभाई पटेल के नजरिए से वर्तमान पर नजर डालें तो यह साफ हो जाएगा, इस भ्रमित विचारधारा ने हमें विनाश की ऊंचाई पर लाकर रख दिया है, ऐसा शब्दों में भाजपा धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रकोष्ठ मुंबई तथा उत्तर पश्चिम जिला संयोजक जितेन्द्र सालुंके ने अपनी क्षुब्ध भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा।

जितेन्द्र सालुंके ने हांल ही में हुए विश्व चषक कप में पड़ोसी पाकिस्तान के विरुद्ध टीम इंडिया की हार के बाद उत्पन्न स्थिति पर कुछ पुराने सन्दर्भ के हवाले से जानकारी देते हुए कहा, वैसे तो खेल में हार-जीत तो होते ही रहती है, लेकिन पाकिस्तान की जीत के बाद भारत में कुछ मुसलमानों ने जश्न मनाना शुरू कर दिया और शरारती तत्वों ने अपनी हदों को पार करते हुए खूब पटाखे चलाए, कई जगहों पर पत्थरबाजी की जिसका मैं निषेध करता हूं। आज की स्थिति से मुझे सरदार पटेल जी के कई सारे संदर्भ याद आ रहे है….

अगर हम आज भी सरदार पटेल के 1948 वाले इस भाषण का अंश पढ़ने पर हमें मुसलमानों ने मजहब नहीं भारत को चुना’ यह एक गलत धारणा को नेहरू गांधी ने हम सब के सिर पर कैसे लाद दिया था इसका अनुभव होगा,

‘मिथक-निर्माण’ किसी भी गणतंत्र की स्थापना की एक आंतरिक विवशता होती है। किसी भी तरह सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने और अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए हर देश के सत्तारूढ़ संस्थान ऐसे ही कुछ मिथकों को गढ़ते हैं, जो उन्हें उनकी मनचाही विचारधारा को सही ठहराने में सहायक होती है। भारत में नेहरूवादी धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना के साथ भी ऐसी तरह की घटना देखने मिली। इस दौरान ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की विचारधारा का मिथक गढ़ा गया।

‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की विचारधारा के मूल सिद्धांतों में से एक यह है कि 1947 में बंटवारे के बाद भारत में पिछे रहे मुसलमानों को हम भारतीय मुसलमान कहते हैं, इन मुसलमानों ने पाकिस्तान के इस्लामिक गणतंत्र को चुनने की बजाय ‘धर्मनिरपेक्ष भारत’ को चुना था, इसलिए उनका अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के सभी कारण जायज हैं। इसने न सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथ को अनदेखा करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, लेकिन इस गलत विचारधारा का महिमामंडन भी किया गया।

इस स्पष्ट झूठ ने असदुद्दीन ओवैसी, फारूक अब्दुल्ला, जैसे कट्टरपंथी या अलगाववादी इस्लामी नेताओं को यह कहने की खुली छूट मिल गई कि, उन्होंने पाकिस्तान की बजाय भारत को चुना था। असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी जो हमेशा गैर मुस्लिम के लिए हिंसा की बात करते और हिंदुओं को बार-बार धमकी देते हुए पाए जाते हैं।

जनवरी 1948 में सरदार पटेल ने कोलकाता में अपने भाषण में हिन्दूओं उन भावनाओं को आवाज़ दी जो हमारे तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष’ नेताओं को गहरा मानसिक आघात दे सकते हैं। सरदार पटेल ने कहा, जो मुसलमान अभी भी भारत में हैं, उनमें से कई ने पाकिस्तान के निर्माण में मदद की है.… तो क्या आज उनका राष्ट्र रातों-रात बदल गया है ? यह समझ नहीं आया कि यह इतना कैसे बदल गया और आप अब कहते हैं कि, यह भारत से वफादार हैं और पूछते हैं कि उनकी वफादारी पर सवाल क्यों उठाया जा रहा है। तो मैं जवाब देता हूँ कि आप हमसे क्यों सवाल कर रहे हैं, स्वयं से पूछिए, यह आपको हमसे नहीं पूछना चाहिए।

सरदार ने आगे कहा है, मैंने मात्र एक बात कही, आपने पाकिस्तान बनाया, आपके लिए अच्छा है। उनका कहना है कि पाकिस्तान और भारत को एक साथ आना चाहिए। मैं कहता हूँ कि, कृपया ऐसी बातें कहने से बचना चाहिए। पाकिस्तान को स्वर्ग बनने दो, हम इससे आने वाली ठंडी हवा का आनंद लेंगे।

इतना कहते ही दर्शक ठहाके लगाने लगते हैं और वो अपनी बात जारी रखते हैं। यह पहली बार नहीं था जब सरदार पटेल ने भारतीय मुसलमानों के पाकिस्तान के प्रति वफादारी की बातों पर अपने विचार व्यक्त किए थे।

9 जनवरी 1950 को, राम लला और माता सीता की मूर्तियों के बाबरी मस्जिद के भीतर अचानक से प्रकट होने के बाद सरदार पटेल ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री जी बी पंत को लिखे अपने पत्र में लिखा था, प्रधानमंत्री ने अयोध्या के घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त करते हुए आपको पहले ही एक टेलीग्राम भेज दिया है। मैंने आपसे लखनऊ में इसके बारे में बात की थी, मुझे लगता है कि, यह विवादित मुद्दा बहुत गलत समय पर उठाया गया है, देश के दृष्टिकोण से भी और अपने स्वयं के प्रांत के दृष्टिकोण से भी। हांल ही में व्यापक सांप्रदायिक मुद्दे केवल विभिन्न समुदायों की आपसी संतुष्टि के लिए हल किए गए हैं। जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, वह अपनी नई वफादारी के लिए सेटल हो रहे हैं।

हालाँकि, हमें यह कभी भी भूलना नहीं चाहिए, मुसलमानों ने भारत को ‘धर्मनिरपेक्षता’ के आदर्शों के कारण नहीं चुना। उनका कहना था कि मुसलमान अपनी संपत्ति, सुरक्षा और अन्य कारणों के कारण भारत में ही रह गए, ऐसें कई संदर्भ जितेन्द्र सालुंके ने प्रस्तुत किए।