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गहलोत सरकार में नियुक्तियां की निराशा

हेम शर्मा खबर

अशोक गहलोत सरकार में न्यास, निगम,आयोग, बोर्ड और संगठन में नियुक्तियां पाने की आस में बैठे प्रदेशभर के नेता इंतजार करते करते थक गए है। सरकार में नियुक्तियां की शहद रूपी सत्ता की लार एक साल से टपकाई जा रही है। सत्ता की चाह में मुंह खोले नेताओं की जीभ पर शहद नहीं आया। उम्मीदों का शहद जम गया है और उम्मीद लगाए बैठे नेता थक चुके हैं। सरकार के कार्यकाल के शेष दो साल में से चार माह उम्मीदों में ही निकलें है। अब भी उम्मीद कब पूरी होगी कोई अता पता नहीं है। अगला साल चुनाव का है। छह माह आचार संहिता में बीतने हैं। अगर आज ही निगम, बोर्ड, आयोग, न्यास और अन्य पदों पर नियुक्तियां होती है तो 16 माह ही बचते है। इस से ज्यादा समय तो नेता पद पाने की दौड़ में लगा चुके हैं। …. राम राम चौधरी, सलाम मियां जी। पगे लागू पांडिया, डंडोत बाबाजी। यह कहते कहते नेता उक्कता गए हैं। राजस्थान में कांग्रेस के नेता सरकार और संगठन में पद पाने की आस में आकाओं को सिफारिशे करते करते थक गए हैं। अशोक गहलोत है जो कांग्रेस में पदों की आस लगाए बैठे नेताओं को दवाब में रख रहे हैं कहावत है …रोटी देवे, खावण कोनी देवे। मांचे देवे, सोवण कोनी देवे। कुटे पण, रोवण कोनी देवे।। पद पाने की लालसा रखने वाला नेताओं की मन स्थिति यह बनी हुई है। पर अशोक गहलोत की सरकार है कि ढबा खेती, ढबा न्याय,_ढबा हुवे बुढिया रो ब्यांव। कोई भी काम युक्ति से ही होता है। गहलोत की युक्ति की नीति, प्रदेश में नियुक्ति की चाह वालों नेताओं की आस और सत्ता के गलियारों का द्वंद्व से असमंजस का माहौल बन गया है। इस द्वंद और असमंजस के कोहरे को साफ किए बिना कांग्रेस और गहलोत का भला नहीं है। अब तो आस लगाए बैठे नेताओं में निराशा का पानी नाक के ऊपर आ गया है। समझो गहलोत साहब।

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