

प्रशांत कुमार/सुपौल
बरसों हुए न तुम ने किया भूल कर भी याद
वादे की तरह हम भी फ़रामोश हो गए……..
चुनावों के मौसम में राजनीतिक पार्टियां जनता को लुभाने के लिए कई वादे करती हैं लेकिन सत्ता में आने पर वादे धरे रह जाते हैं। शायर जलील मानिकपुरी ने वादों पर कलाम लिखे हैं जो राजनीतिक पार्टियों पर भी सटीक बैठते हैं।बिहार में चुनावी बिगुल बज चूका है ।जिले के सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र 44 त्रिवेणीगंज लगभग प्रत्येक पार्टी के प्रत्याशी के नाम चुनावी दंगल लड़ने के लिए पूर्ण रुप से घोषित हो चुके है। चुनाव में वादो से बने पुलाव की खुशबू जनता तक पहुंचायी जा रही है। पर ये पुलाव जनता की थाली में जायेगे की नही ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगे।इस वक्त बिहार चुनावी माहौल से गुजर रहा है पिछले चुनाव में जीते नेताओं ने अपने वादे पूरे किये ही नही है और इस बार विधानसभा चुनाव मे फिर नेता अपने कई मुद्दे लेकर जनता के बीच उतर गए है।पर किसी की नज़र जनता के उस दर्द पर नही पड़ रही जिससे जनता कराह रही है।यहां तक की अधिकारी भी जनता की सुध नही ले रहे। बस बहुत हो गया। ‘माननीय दिखते नहीं, अफसर मिलते नहीं’ यह दर्द अब और बर्दाश्त नहीं करेंगे। सिर्फ वादों पर अब वोट नहीं देंगे। लिखकर लेंगे और जवाब भी मांगेंगे। माननीय को अब पांच साल तक जनता के बीच रहकर काम करना होगा।


बताना होगा कि अगर वह पहले विधायक रहे हैं तो जनता और क्षेत्र के विकास के लिए क्या-क्या किया और विधायक बनने पर अगले पांच साल का क्षेत्र के विकास का क्या एजेंडा है। और इसे मौखिक नहीं बल्कि लिखकर देना होगा। ‘सच का सामना’ करने वाले को ही वोट देंगे।
नए प्रत्याशियों का बैक ग्राउंड देखेंगे। युवाओं ने कहा कि बिना विजन और बेहतर बैकग्राउंड के वोटों की उम्मीद लगाए नेताजी को मुंह की खानी पड़ेगी।
