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चैत्र नवरात्रि 13 अप्रैल से प्रारंभ, जानिए क्या होगी मां दुर्गा जी की सवारी, घटस्थापना के शुभ मुहूर्त व विधि : पं नीरज

नवरात्रि हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। नवरात्रि को पूरे देश में धूमधाम के साथ मनाया जाता है। मां दुर्गा जी की उपासना के नौ दिन भक्तों के लिए बेहद खास होते हैं। इन दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। कई भक्त नवरात्रि के नौ दिन व्रत रखते हैं तो कई पहला और आखिरी रखकर मां दुर्गा की उपासना करते हैं नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा जी की विधि-विधान से पूजा करने से कई गुणा फल प्राप्त होता है। इस साल चैत्र नवरात्रि 13 अप्रैल से शुरू होकर 21 अप्रैल तक रहेंगे।
-इस बार अश्व होगी मां की सवारी:- इस वर्ष चैत्र नवरात्रि मंगलवार के दिन से शुरु हो रहे हैं, इसलिए मां की सवारी अश्व यानी घोड़ा मानी जाएगी। शास्त्रों में मां दुर्गा का अश्व पर आना गंभीर माना जाता है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, नवरात्रि पर मां दुर्गा जब घोड़े की सवारी करते हुए आती हैं तो इसका असर प्रकृति, देश आदि पर देखने को मिलता है।
– घटस्थापना का शुभ मुहूर्त: दिन- मंगलवार तिथि- 13 अप्रैल 2021 शुभ मुहूर्त- सुबह 05 बजकर 28 मिनट से सुबह 10 बजकर 14 मिनट तक।
– घटस्थापना का दूसरा शुभ मुहूर्त:- सुबह 11 बजकर 56 मिनट से दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक।
– नवरात्रि घटस्थापना पूजा विधि: मिट्टी को चौड़े मुंह वाले बर्तन में रखें और उसमें सप्तधान्य बोएं। अब उसके ऊपर कलश में जल भरें और उसके ऊपरी भाग (गर्दन) में कलावा बांधें। आम या अशोक के पत्तों को कलश के ऊपर रखें। नारियल में कलावा लपेटे। उसके बाद नारियल को लाल कपड़े में लपेटकर कलश के ऊपर और पत्तों के मध्य रखें। घटस्थापना पूरी होने के पश्चात् मां दुर्गा जी का आवाहन करते हैं।
– नवरा‍त्रि का विशेष महत्त्व

नवरात्रि का अर्थ होता है, नौ रातें। हिन्दू धर्मानुसार यह पर्व वर्ष में दो बार आता है। *एक शरद माह की नवरात्रि और दूसरी बसंत माह* की इस पर्व के दौरान तीन प्रमुख हिंदू देवियों- *पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती* के नौ स्वरुपों श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री का पूजन विधि विधान से किया जाता है। जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं।

प्रथमं शैलपुत्री च

द्वितीयं ब्रह्माचारिणी।

तृतीय चंद्रघण्टेति

कुष्माण्डेति चतुर्थकम्।

पंचमं स्कन्दमातेति

षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रि

महागौरीति चाऽष्टम्।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः।

नवरात्र शब्द से ‘नव अहोरात्रों* (विशेष रात्रियां) का बोध’ होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि ‘रात्रि’ शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। जैसे- नवदिन या शिवदिन। लेकिन हम ऐसा नहीं कहते।

– नवरात्र के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले हम नवरात्र को समझ लेते हैं…

मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है- विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात *चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा* (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक। इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्र मनाया जाता है।

लेकिन, फिर भी सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। यहां तक कि कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

जबकि मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। *अब तो यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक तथ्य भी है कि रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं।* हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने ही हजारों-लाखों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे।

आप अगर ध्यान दें तो पाएंगे कि अगर दिन में आवाज दी जाए, तो वह दूर तक नहीं जाती है, किंतु यदि रात्रि में आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है।

इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं।

रेडियो इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। आपने खुद भी महसूस किया होगा कि कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है।

इसका वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं ठीक उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है।

इसीलिए ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है। मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है।

यही रात्रि का तर्कसंगत रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपनी शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं, उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है।

वैज्ञानिक आधार…

नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां हैं जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है।

– ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ‘नवरात्र’ है।

अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी ‘नवरात्र’ नाम सार्थक है।* चूंकि यहां रात गिनते हैं इसलिए इसे नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है।

रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और, इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है।

इन मुख्य इन्द्रियों में अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन, नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।

हालांकि शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर ६ माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है जिसमें सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है, क्योंकि स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।

– चैत्र और आश्विन नवरा‍त्रि: ही मुख्य माने जाते हैं इनमें भी देवी भक्त आश्विन नवरा‍त्रि का बहुत महत्व है। इनको यथाक्रम वासंती और शारदीय नवरात्र कहते हैं। इनका आरंभ चैत्र और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को होता है। ये प्रतिपदा ‘सम्मुखी’ शुभ होती है।

– दिन का महत्व:
नवरात्रि वर्ष में चार बार आती है। जिसमे चैत्र और आश्विन की नवरात्रियों का विशेष महत्व है। चैत्र नवरात्रि से ही विक्रम संवत की शुरुआत होती है। इन दिनों प्रकृति से एक विशेष तरह की शक्ति निकलती है। इस शक्ति को ग्रहण करने के लिए इन दिनों में शक्ति पूजा या नवदुर्गा की पूजा का विधान है। इसमें मां की नौ शक्तियों की पूजा अलग-अलग दिन की जाती है। पहले दिन मां के शैलपुत्री स्वरुप की उपासना की जाती है। इस दिन से कई लोग नौ दिनों या दो दिन का उपवास रखते हैं।

– पहले दिन की पूजा का विधान:
इस दिन से नौ दिनों का या दो दिनों का व्रत रखा जाता है। जो लोग नौ दिनों का व्रत रखेंगे वो दशमी को पारायण करेंगे। जो पहली और अष्टमी को उपवास रखेंगे वो नवमी को पारायण करेंगे। इस दिन कलश की स्थापना करके अखंड ज्योति भी जला सकते हैं। प्रातः और सायंकाल दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और आरती भी करें।
अगर सप्तशती का पाठ नहीं कर सकते तो नवार्ण मंत्र का जाप करें। पूरे दस दिन खान-पान आचरण में सात्विकता रखें। मां को आक, मदार, दूब और तुलसी बिल्कुल न चढ़ाएं। बेला, चमेली, कमल और दूसरे पुष्प मां को चढ़ाए जा सकते हैं।

मित्रोँ कल दिनांक 13अप्रैल 2021 को चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा तिथि के आगमन के साथ चैत्र शुक्ल की नवरात्रि का प्रारंभ होने जा रहा है कल माता रानी अपने नन्हे कदमों से हम सभी के घर मे नौ दिनो तक अपनी कृपा और आशीर्वाद देने आ रही है
और हम सब मिलकर माँ का अभिनन्दन और पूजन करें

(घट स्थापना मुहूर्त )

मित्रों कल प्रतिपदा तिथि प्रातः 10:26 तक ही रहेगी उसके उपरांत द्धितीया तिथि प्रारंभ हो जायेगी तो आप सभी लोग उसके पहले ही कलश स्थापना कर ले ।

【पूजन विधी 】पूजन विधि आप लोग जैसे सामान्य रूप से माता की पूजा करते है वैसे ही पूजा करें हा माता की पूजा मे लाल फूल और लौंग का जोड़ा अवश्य अर्पित करें माता को भोग मे केले और अनार का फल अवश्य अर्पित करें जो भी स्त्रिया माता रानी को श्रंगार कि सम्रागी अर्पित करती है वो लाल रंग के वस्त्र और लाल चूड़ी और लाल बिंदी अर्पित करें तो अति उत्तम है ।।

【दुर्गा सप्तशती की पाठ विधी】नवरात्रि के 9दिनों मे जो लोग भी दुर्गा सप्तशती का पाठ करते है वो लोग पाठ करने से पहले कवच , अर्गला स्रोत और कीलक स्रोत का पाठ करें उसके बाद पाठ प्रारंभ करें पाठ विधि मे आप प्रथम चरित्र , मध्यम चरित्र उत्तम चरित्र इस तरह.से भी पाठ कर सकते है और यादि आप दूसरी विधि से पाठ करना चाहते है तो आपको प्रतिदिन दो अध्याय पढ़ने होगे सप्तमी तक आप तेरह अध्याय पूरे कर लेगे
【विधि】पहले दिन 1 और 13 अध्याय
2 दिन 2 और 12 अध्याय
(3) दिन 3 और 11अध्याय
(4)दिन 4 और 10व अध्याय
(5)दिन 5 और 9 वा अध्याय

(6)दिन 6 और 8वा अध्याय
(7)दिन 7 वा अध्याय दो बार पढ़ना है

【कन्या पूजन】9 वर्ष से छोटी कन्या को आप अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन कराये और अपनी श्रद्धा अनुसार उनको दक्षिणा और उपहार दे 9कन्या और उनके साथ एक बालक को अवश्य भोजन करायें कोरोना काल को देखते हुए मै यही कहूंगी यादि आपके घर मे कन्या हो तो उसके पैर पूज ले और अगर नही तो आप धन राशि निकलकर रख दे और बाद मे उसे किसी सामूहिक कन्या भोज मे दे दे और गाय को प्रसाद खिलाकर व्रत का पारण कर ले
माता को प्रतिपदा और अष्टमी के दिन नरियल प्रसाद के रुप अवश्य अर्पित करें माता को शहद अतिप्रिय है तो प्रतिदिन उसको भोग के रुप मे अवश्य अर्पित करें

【शीघ्र विवाह के लिए नवरात्रि मे उपाय 】
जिन कन्या और बालक के विवाह मे रुकावट आ रही हो वो लोग कल एक लाल धागे मे अपनी उमर के बराबर लौंग पिरोकर माता रानी को अर्पित करें

【मंत्र】 माता रानी का सबसे विशेष मंत्र है वो है नरवाण मंत्र है वो आपको दुर्गा सप्तशती मे दिया शुरुआत के पृष्ठ पर इसके अलावा आप
ऊँ दुंग दुर्गाय नमः या नवार्ण मंत्रका प्रतिदिन 108 यानी एक माला जप करें।आप सभी मित्रो को नवरात्री की शुभ कामना।।

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