-सरकारी विश्वविद्यालयों ने छात्रों की उत्तर पुस्तिका (कॉपी) चेक करने का काम दे रखा है ठेके पर?
-ठेकेदार को नाम दे रखा है कोऑर्डिनेटर जो की है प्राइवेट कॉलेजों से

जयपुर। राज्य के सरकारी विश्वविद्यालयों के छात्रों व उनके अभिभावकों को आश्चर्य होगा कि परीक्षा की कॉपी ठेकेदार के माध्यम से चेक हो रही है। ठेकेदार भी ऐसा जिसकी खुद नौकरी का पता नहीं। कल ‘लाला’ गार्ड से कहकर एंट्री बंद करवा दें कोई पता नहीं। कायदा यह है सरकारी टीचरों के माध्यम से कॉपियां चेक होनी चाहिए। यह बड़ा गंभीर मामला है वह भी तब जबकि रीट का मामला अभी काफी चर्चाओं में है।
सूत्रों ने बताया कि राज्य के सरकारी विश्वविद्यालयों ने छात्रों की कॉपियां चेक करने के लिए कोऑर्डिनेटर (ठेकेदार) बनाए हुए हैं। विश्वविद्यालय से बंडल बनकर कोऑर्डिनेटर के पास पहुंचते हैं और कोऑर्डिनेटर कॉपियों को चेक करने के लिए टीचर को दे देते हैं। कॉपियां चेक होने के बाद कोऑर्डिनेटर वापस काॅपियां विश्वविद्यालय को भेज देते हैं।
सूत्रों ने बताया कि यूजी कि 300 कॉपियों का बंडल बनता है, तो पीजी की 210 कॉपियों का। एक टीचर को अधिकतम 60 हजार तक भुगतान कॉपियां जांचने का होता है। कोऑर्डिनेटर को पता होता है किस कॉलेज का बंडल किस टीचर को दिया हुआ है। ऐसे में अगर किसी ‘रहीसजादे’ को अपनी कॉपी या कोई कॉलेज प्रबंधन कोई सेटिंग करनी है तो कोऑर्डिनेटर के द्वारा ही हो सकती है।
सूत्रों ने बताया कि कोऑर्डिनेटर बड़ी सिफारिश पर बनाए जाते हैं। सिफारिश भी इस स्तर की कि कुलपति को ना चाहते हुए भी मानना पड़ता है। यह कुलपति का क्षेत्राधिकार है वह किसी को भी कोऑर्डिनेटर बना सकते हैं। वर्तमान में जगत सिंह जोधपुर, उदयपुर, भरतपुर और अजमेर विश्वविद्यालय के कोऑर्डिनेटर है। अभिलाषा चौधरी अजमेर, सीकर, उदयपुर और भरतपुर विश्वविद्यालय की कोऑर्डिनेटर हैं। दीप्तिमा शुक्ला अजमेर विश्वविद्यालय की कोऑर्डिनेटर हैं। कुसुम चौधरी भरतपुर और सीकर विश्वविद्यालय की कोऑर्डिनेटर हैं। कुछ समय पहले तक सुमन नरूका भी कोऑर्डिनेटर थीं अब उन्हें नहीं बनाया गया। ये सभी प्राइवेट कॉलेज में कार्य कर रहे हैं।
सूत्रों ने बताया कि काफी समय से परीक्षा की योग्यता पर सवाल खड़े हो रहे थे प्राइवेट कोऑर्डिनेटर के माध्यम से कॉपियां चेक होने के कारण इसलिए कोटा विश्वविद्यालय ने इस बंदरबांट पर रोक लगा दी है। वहां के कुलपति ने स्पष्ट नियम बना दिया है कि सरकारी लेक्चर या सरकारी टीचर में से ही कोऑर्डिनेटर बनाएंगे।
सवाल खड़ा होता है सरकारी लेक्चरर-टीचरों की लंबी फौज है। वेतन भी लंबे-चौड़े फिर उनमें से किसी को कोऑर्डिनेटर क्यों नहीं बनाया जाता? सभी को पता है प्राइवेट कॉलेजों में वेतन किस स्तर का मिलता है, गड़बड़ी लाजमी है! कोरोना काल में तो वह भी नहीं मिलती थी। कहावत है ‘जाकी जितनी बाजरी, वाकी उतनी चाकरी’ और ‘भूखे पेट भजन ना होय गोपाला।’ प्राइवेट वाला घर तो चलाएगा ऐसे में भरपाई कहां से होगी? सोचनीय बिंदु है। कोटा विश्वविद्यालय की तरह अन्य विश्वविद्यालयों को भी सरकारी कोऑर्डिनेटर के माध्यम से कॉपियां चेक कराने का नियम बनाना छात्रों के भविष्य के हित में होगा।