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छिनैती को बना दिया चोरी


-पीड़ित के पास फुटेज, जांच अधिकारी ने माना मामला झूठा, पेश कर दी एफआर
(हरीश गुप्ता)
जयपुर। राजधानी में पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली लागू होने के फायदे तो कई सामने आए, लेकिन लगता है कुछ अधिकारियों की नजर कमजोर हो गई। छिनैती के मामले को चोरी में दर्ज किया और सबूत होने के बाद भी उस पर एफआर लगा दी।
जानकारी के मुताबिक मामला मोती डूंगरी थाना क्षेत्र का है। तीन मूर्ति सर्किल पर एक दवा की दुकान में 10 जून की दोपहर बालाजी एजेंसी नाम का दवा सप्लायर आया। वह कोई डिब्बा बदलने की कहने लगा। दुकान में मौजूद सेल्समैन संजय कुमार शर्मा ने कहा कि दुकान मालिक आ जाए, उनसे बदलवा लेना। सप्लायर को सहन नहीं हुआ, उसने कार में साथ आए दो जनों को इशारा कर बुलाया।
जानकारी के मुताबिक पुलिस रिपोर्ट में बताया कि एक व्यक्ति ने आते ही दुकान के काउंटर पर रखी कैंची संजय की कनपटी पर तान दी और घूसों से मारपीट कर उसकी जेब में रखे रुपए निकाल कर चलते बने। वह पीछे-पीछे आया और अपने मोबाइल से वीडियो बनाने लगा। इस बीच चालक ने उसका मोबाइल छीन लिया और गाड़ी स्टार्ट कर रवाना हो गए। संजय ने तत्काल पुलिस कंट्रोल रूम फोन किया तो वहां पुलिस आ गई।
पीड़ित संजय ने बताया कि बाद में वह मोती डूंगरी थाने गया और घटना की रिपोर्ट दर्ज करवा दी। रिपोर्ट में गाड़ी नंबर और मोबाइल नंबर आदि भी लिख दिए। पुलिस ने रिपोर्ट में आईपीसी की धारा 323, 341, 379 और 504 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया। संजय ने बताया कि कई बार कहने के बाद 6 दिन बाद उसका मेडिकल करवाया गया। मेडिकल के दौरान हुए एक्स-रे वालों ने पुन: एक्स-रे करवाने के लिए कहा, लेकिन जांच अधिकारी रमेश चंद्र हर बार सरकारी कार्य में व्यस्त होने की कहता रहा। नतीजतन आज तक दूसरी बार एक्स-रे नहीं हुआ। सवाल खड़ा होता है एक्स-रे करवाना कोई सरकारी कार्य नहीं था?
संजय ने बताया कि पुलिस का रवैया देख वह डीसीपी, एडीसीपी, एसीपी और थाना प्रभारी से मिला, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
जानकारी के मुताबिक सीसीटीवी कैमरे में घटना कैद है जिसकी फुटेज संजय के पास है। इसके अलावा सरकारी कैमरों की उस घटना की फुटेज किसी तरह चेक करवाई गई तो उसमें भी काफी कुछ दिखाई दे रहा था, जबकि जांच अधिकारी ने सरकारी कैमरों की फुटेज देखने की जहमत तक नहीं उठाई।
इस मामले में जांच अधिकारी रमेश चंद्र का कहना है, ‘मामले में एफआर लग चुकी है।’ वहीं थाना प्रभारी सुरेंद्र पंचोली का कहना है, ‘घटना के बाद उन्होंने दवा सप्लायर भरत अग्रवाल को बुलाया था, भरत अग्रवाल का कहना था कि मोबाइल उनकी गाड़ी में गिर गया था। भरत अग्रवाल की तबीयत भी ज्यादा अच्छी नहीं रहती।’ सवाल खड़ा होता है पीड़ित को मोबाइल अब तक वापस क्यों नहीं दिलाया गया? दवा सप्लायर से मारपीट करने वालों के नाम क्यों नहीं पूछे गए? क्या पुलिस ने पीड़ित के फुटेज सही से देखे? अगर मामला झूठा है तो संजय के खिलाफ झूठी रिपोर्ट रिपोर्ट दर्ज कराने की 182 की कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है किसी भी मामले में एफआर या चालान पेश करने की सिफारिश एसीपी करते हैं। क्या एसीपी राजवीर सिंह ने सबूत सही से चेक किए? क्या सभी की नजर कमजोर हो गई? मामले का पीड़ित पत्रकार का भतीजा है, अधिकारियों को यह अच्छे से पता था। अगर पीड़ित गलत था तो क्या वे फुटेज झूठे हैं? क्या पुलिस को खुद के कैमरे पर भरोसा नहीं? क्या उनकी फुटेज चेक की? क्या जांच अधिकारी से लेकर एसीपी तक के अधिकारी अंतर्यामी है? अगर है तो कई अनसुलझे हत्याकांड की जांच इन्हें क्यों नहीं सौंपी जा रही? वरना दोषियों के खिलाफ कार्रवाई कब होगी।

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