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जब जरूरी तब साथ छूटना, अर्थात मन टूटना!

श्रीगंगानगर।[गोविंद गोयल] जो वैवाहिक जीवन का आधार है। जो पुरुष के खुशहाल, ऊर्जावान और मुस्कुराहट से सराबोर जीवन का सार है। उस पर सबसे अधिक लतीफ़े बनाए और सुनाए जाते हैं। यस! आप समझ गए। इशारा पत्नी की ओर है। एक की ओर नहीं सभी की ओर। इससे पहले कि कोई इशारे का अर्थ गलत ले, दो सच्ची बातों से बात को आगे बढ़ाते हैं। एक परिचित मिले। उनको सरकारी सेवा से रिटायर हुए काफी समय हो गया था। मैंने पूछ लिया, रिटायरमेंट के बाद का जीवन कैसे है? उनके शब्द थे, कैसा जीवन! कौनसा जीवन! पत्नी को गुजरे 5 साल हो चुके हैं। यूं बच्चे सब सैट हैं लड़कियां अच्छे घरों मेँ ब्याही हैं। खूब पेंशन मिलती है।

इसके बावजूद मजा नहीं है। थोड़े से शब्दों मेँ उन्होने जो कुछ कहा, उसके बाद उनके अंदर का एकांत, तनहाई की पीड़ा चेहरे पर नजर आने लगी। कहने का सीधा मतलब ये था कि सबके रहते, लगता है जैसे, कोई नहीं है मेरा। इससे पहले की वे और भावुक होते, चर्चा का विषय बदल दिया गया। इसी संवाद के कुछ मिनट्स पहले मैं जिनसे बात कर रहा था, उनका दर्द भी ऐसा ही था। लगभग 55 साल के इस व्यक्ति की पत्नी लंबे अरसे से बीमार है। देखभाल करनी पड़ती है। कई लाख रुपया लग चुका। किन्तु अभी तक उसे चलने, बैठने के लिए सहारे की जरूरत है। मन का दर्द बताते बताते अंदर का दर्द आँखों मेँ नमी के रूप मेँ नजर आने लगा। उसने आँखें पोंछी। मैंने उसे बाहों मेँ ले उसकी पीठ थपथपाई। ये दो संवाद कहानी, किस्से नहीं, बल्कि पूरी तरह सच है।

ये संवाद ये साबित करने के लिए काफी है कि एक उम्र के बाद पत्नी की जरूरत सबसे अधिक होती है। जिसकी जरूरत सबसे अधिक है, उसी का मज़ाक बनाया जाता है। इसके बावजूद उनकी ओर से कभी कड़ी प्रतिक्रिया नहीं आती। यही सब पतियों के बारे मेँ कहा और सुना जाए तो पति लोग ना जाने कितने ताने दे दे कर उनकी मानसिक शांति भंग कर दें। खैर! लतीफे आज का विषय नहीं। विषय है, एक उम्र के बाद पति-पत्नी को एक दूसरे की जरूरत। ये जरूरत, एक दूसरे की मजबूरी नहीं जरूरी है। एक यही रिश्ता है जो सबसे अधिक लंबा होता है। एक मात्र यही संबंध है जो सबसे करीबी होता है। कभी दो अंजान व्यक्तियों को इस प्रकार से मिलाया जाता है कि एक समय के बाद वे एक दूसरे के पूरक होने लगते हैं। एक दूसरे के बिना अधूरे लगने लगते हैं। एक ना हो तो दूसरे को कुछ सुहाता नहीं, भाता नहीं। ये उस वक्त की बात है जब बच्चे अपने अपने कैरियर मेँ व्यस्त हो जाते हैं। अपनी गृहस्थी बढ़ाने, जमाने के प्रबंध करने शुरू कर देते हैं।

अपने बच्चों की कैरियर की चिंता करने लगते हैं। उस वक्त बुजुर्ग हो चुके या बुजुर्ग होने की ओर बढ़ रहे पति-पत्नी ही एक दूसरे का एकांत दूर करने का साधन, माध्यम होते हैं। दोनों मेँ प्रेम हो ना हो, किन्तु मित्रता अवश्य हो जाती है। वो जमाना और था जब इस उम्र मेँ पति या पत्नी मेँ से किसी एक के ना रहने पर पूरा समय पोते-पोतियों को खिलाने, कहानी सुनाने, उनके साथ बच्चा बने रहने मेँ बीत जाता था। आज के दौर मेँ तो वे बुजुर्ग बड़े खुशनबीब होंगे, जिनके एकांत को पोता-पोती दूर करते हैं। क्योंकि नए दौर मेँ ये सोच विकसित हो चुकी है कि दादा-दादी के पास बच्चे बिगड़ जाएंगे। संस्कारी नहीं रहेंगे। या दादा-दादी के साथ रहेंगे तो कुछ नहीं सीखेंगे। ऐसी सोच ने 60 साल के आस पास और उससे ऊपर के उन पति-पत्नी को अलग थलग कर दिया है, जो साथी का साथ छूट जाने के बाद अकेले रह गए हैं। नारी तो किसी तरह अपना एकांत घर के किसी कोने मेँ कुछ भी सह कर काट लेती है, किन्तु मुश्किल उन पतियों की होती है, जिनकी पत्नी नहीं रही और घर मेँ बहुएं हैं। घर मेँ संवाद करने वाला कोई होता नहीं। ऐसे मेँ एकांत और अधिक पीड़ा देने वाला हो जाता है। ये समस्या ऐसी है कि समाज इसमें अधिक कुछ नहीं कर सकता। कुछ समझौता एकल पति या पत्नी को करना पड़ेगा और थोड़ा उनके अच्छों को। नहीं तो बुजुर्गों की स्थिति और अधिक खराब होती चली जाएगी।

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