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जीवन की गाड़ी में व्रत व नियम रूपी ब्रेक आवश्यक- विनयकुशलमुनि

गणाधीश प्रवर के आह्वान पर सैंकड़ों श्रावक-श्राविकाओं ने स्वीकार किए व्रत
सामुहिक सामायिक का आयोजन रविवार को
(चन्द्रप्रकाश बी. छाजेड़)
बाड़मेर, 02 नवम्बर। शनिवार को प.पू. गणाधीश पन्यास प्रवर विनयकुशलमुनिजी म.सा. की निश्रा में सैंकड़ों की संख्या में युवक-युवतियों व पुरूष एवं महिलाओं द्वारा चतुर्थ ब्रह्मचर्य व्रत(अर्ध दीक्षा), बारह व्रत, सप्त व्यसन जुआ, चोरी, मांस भक्षण, मदिरा सेवन, शिकार, परस्त्रीगमन, वेश्यागमन इन सप्त व्यसन का आजीवन त्याग एवं विविध नियम व व्रत आदि ग्रहण किए।

शनिवार को प्र्रातः 9 बजे स्थानीय आराधना भवन में चतुर्मुख परमात्मा के समवसरण (नांद) की रचना की गई और गणाधीश भगवंत द्वारा एक-एक व्रत के बारे में समझाते हुए विधिपूर्वक देव-गुरू-धर्म की साक्षी में व्रतों का आरोपण करवाया गया एवं नंदीसूत्र सुनाया गया। इस अवसर पर 20 वर्ष के युवान युवक-युवतियों सहित 68 वर्ष तक के बुजुर्ग पुरूषों व महिलाओं ने चतुर्थ ब्रह्चर्य व्रत, बारह व्रत, चैदह नियम, सप्त व्यसन सहित अनेक प्रकार के त्याग के संकल्प लिए।

इस अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए विरागमुनिजी म.सा. ने कहा कि श्रमण संस्कृति आत्मा की संस्कृति है। आत्मा के संस्कार को, मन के परिमार्जन को और बुद्धि के प्रक्षालन को श्रमण धर्म में, श्रमण विचारधारा में और श्रमण संस्कृति में बड़ा महत्व दिया गया है। बाहरी जीवन की अपेक्षा उसने भी भीतरी जीवन को संभालने का अधिक काम किया है। वह साधक को भोग से योग की ओर, विलास से वैराग्य की ओर तथा प्रवृति से निवृति की ओर ले जाता है। आचार की पवित्रता एवं विचार की विराटता जैन संस्कृति का मूल आधार है। संयम भारतीय संस्कृति की आत्मा है। जिस तरह फसल की सुरक्षा के लिये वाड़ की आवश्यकता होती है उसी तरह जीवन के संरक्षण, संवर्धन एवं विकास के लिये नियम, व्रत, संयम आवश्यक है।
सामुहिक सामायिक का आयोजन रविवार को-
परम पूज्य खरतरगच्छाचार्य जिनपीयूषसागर सूरीश्वर महाराज साहब की सूरि मंत्र की पंचम पीठिका की पूर्णाहुति पर बाड़मेर नगर में आराधना भवन में दोपहर में 2 बजे सामुहिक सामायिक आयोजन गुरूभक्त परिवार द्वारा किया गया है। जिसमें सभी को भाग लेने का आह्वान किया गया है।

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