

देश के माथे पर लगे इस कलंक को लेकर कई प्रकार के सवाल उठ रहे है और उठाये जायेंगे |जैसे जहाँ खालसा का झंडा लगा यह वो पवित्र ध्वज स्थल है जहाँ पर १५ अगस्त को भारत के प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते है|इसे राष्ट्रीय स्मारक का अपमान कहा जा रहा है | ज्यदा पुरानी बात नहीं है, साल भर नहीं बीता है, दिल्ली दौरे में लालकिला पहुंचा तो पता चला अब लाल किला में शौचालय और पेय जल की व्यवस्था तो हो चुकी हैं। लेकिन जिस वैश्विक स्तर पर पर्यटकों को जो सुविधाएं देने के बात कही गई थी, वह कहीं नजर नहीं आती है। आपको याद होगा, लाल किले को केंद्र सरकार करीब सौ से ज्यादा ऐतिहासिक इमारतों, किलों, महल और मंदिरों के साथ एक निजी कम्पनी के हवाले कर चुकी है। ऐसे अधिकांश किले-महल-मंदिर जो पहले भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन होते थे, अब किसी निजी कम्पनी के हवाले हैं । कई ऐतिहासिक-सांस्कृतिक इमारतें विश्व-विरासत की सूची में भी शामिल हैं। भारत की ऐतिहासिक विरासतों को निजी कंपनियों को सौंपने के पीछे जो तर्क और कारण दिए गए वो बहुत ठोस नजर नहीं आते हैं। आज पवित्रता की बात करना बेमानी है |१३ अप्रैल, २०१८ से विश्व विख्यात लाल किला डालमिया भारत लिमिटेड के पास है । वैसे यह तथ्य जग जाहिर है कंपनी सीएसआर इनिशिएटिव यानी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत इनका रखरखाव कर रही है । अब शौचालय, पीने का पानी, रोशनी की व्यवस्था हुई है |


अब बात जवाबदारी की | केंद्र और दिल्ली सरकार के बाद क्षमा याचना के साथ माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी इस स्थिति की जवाबदारी से मुकर नहीं सकते| हमेशा दोहरे आदेश के भंवरजाल के नाम पर अपनी खाल बचाती दिल्ली पुलिस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ज्यादा भरोसा जो कर लिया था |
जिम्मेदारी कोई लेगा नहीं, जो जानें जानी थी चली गई | मुआवजा पीड़ा कम करेगा, पर “गण” और “तंत्र” के बीच बनी खाई कैसे पटेगी ? लाख नहीं करोड़ो का सवाल है |जो हाथ इस खाई को और चौड़ी करने में लगे है, उन पर करोड़ों के एवज में यह सब करने कराने के आरोप भी लग रहे है | सही क्या है ? गलत क्या है ? मालूम नहीं |बस इतनी बात पुख्ता है,”गण” “तंत्र” के खिलाफ है और “तंत्र” “गण” को १९४७ के पहले का ही हिन्दुस्तानी मानने की भूल कर रहा है | ऐसे में आपकी जिम्मेदारी बनती है उन हाथो को मरोड़ दें जो इस खाई को रात दिन चौड़ी कर रहे हैं |
