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देश में चोला बदलती राजनीतिक संस्कृति

जब देश आजादी की ओर था तब हमारे यहां पार्टी और नेताओं में त्याग और देश के लिए कुछ करने, मर मिटने का जज्बा था। आज का दौर बिल्कुल अलग हो गया एक मोहल्ले में आठ दस स्वागत मंच और सभी पर डीजे जिसमें रंग दे बसंती, चिट्ठी आई है, ऐ मेरे वतन के लोगों यह सभी राष्ट्रप्रेम गीत बड़े जोर शोर से बचाए जाते हैं। युतो पर्यावरण सुधारो कहेगे पर फूलों की बौछार कुछ मिनटों के अंदर सडको पर हो जाती है। भैया याने नेता जी ने बोला है इसलिए छुटभिया इक्कठे हो जाएंगे। और जिस नेता का स्वागत हजारों लाखो की भीड करती हैं कि सोचती है वह मुझे पहचान लेगे। सैकड़ों हजारों पोस्टर से शहर पट जाता है कहने को तो साफ सुथरा शहर लेकिन किसी महान विभूति के आने पर पूरा शहर मानो पार्टी का गढ हो गया। जमाने भर के झंडे, भैया नेताओं के फोटो, दौड़ती गाड़ियां, हजारों लाखों लोग रैली में आगे पीछे भागते नजर आएंगे, रोड शो का जमाना है कि जिस का शो जबरदस्त वह सबसे बड़ा नेता। सारा खेल पैसा और ताकत के आस पास आ गया। एक अंदाज अनुसार 50 लाख से एक करोड रुपए एक बडी रैली पर खर्च होते होगे। अखबारों में विज्ञापन, जगह जगह पोस्टर, झंडे, स्टेज, माइक, टेंट, फूल आदि और किराए से लाई गई भीड़ का यह सब खर्चा कौन करता है, क्या कभी इसका इनकम टैक्स में विवरण आया। ऐसी राजनीतिक रेलिया और सभाए आये बगारे होने लगी है। देश में अनेक पार्टियां है और उनके प्रमुख लीडर हैं इन सबका खर्च देखकर कहीं से लगता नहीं कि भारत एक गरीब देश है। यदि इतना सब रुपया और समय विकास, उद्योग, शिक्षा, खिलाड़ियों के खेल पर खर्च होने लगे तो देश का नाम कितना रोशन होगा। जिस देश में ऐसे फालतु खर्च नहीं होते उस देश का माहौल कुछ अलग होता है। फिर भी कहेंगे सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा।
अशोक मेहता, (लेखक, पत्रकार, वास्तुविद्)

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