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धर्मगुरु भिन्न-भिन्न मान्यता क्यों बनाते हैं

किसी विशेष समाज को छोड़ दो जिसमें सिर्फ एक ही धर्म गुरु होते है। बाकी समाजों में अनेक धर्मगुरु होते हैं कह नहीं सकते। कितने वास्तविक संत हैं और कितने संत के नाम की दुकानदार। प्रश्न यह है कि संत के हाथ में यह पावर किसने दिया कि वह मान्यता का निर्धारण करें। यद्यपि समाज में रहने वालों की और संत की मान्यताओ और मर्यादा का निर्धारण स्वयं समाज करें। पर कुछ लोग संत की अंधभक्ति में लिप्त संत को इस कदर भाव देते हैं कि उन्हें भगवान का दर्जा देते हैं, और जब संत को लगता है कि मैं तो भगवान हूं बस फिर वह नए-नए राग अलापने लगते हैं। यहां मैं कतई या नहीं कर रहा हूं कि सब संत ऐसे हैं मैं सिर्फ इतना कह रहा हूं कि कुछ संत ऐसे हैं कि जो अपनी अपनी मान्यता अलग दिखाने की कोशिश में समाज में अलग-अलग रीति रिवाज पैदा कर देते हैं।

संत उसे कहते हैं जिसने संसारीक जीवन त्याग दिया हो और ईश्वर की आराध्य में अपने आप को समर्पित कर दिया हो।* उसे किसी प्रकार का मोहामाया नहीं होता हे किसी प्रकार के डोंग ढकोसला भी नहीं होते किसी प्रकार का शोआफॅ भी नहीं होता। वह एक सरल भिक्षुक होता है जो सदैव जनता में बेहतर जीवन के लिए उपदेश देता है। संत की परिभाषा आज के जमाने में बदलती जा रही है तामझाम और झूठे चमत्कार के बल पर कई अपने आप को बड़ा ज्ञानी संत साबित कर रहे हैं। इनसे बचे।
अशोक मेहता, इंदौर (लेखक, पत्रकार, वस्तुविद्)

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