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पत्रकारिता के मुक्कमल पायदान पर धमाकेदार पत्रकारिता के हस्ताक्षर :कपिल भट्ट

प्रस्तुत कर्ता :हरप्रकाश मुंजाल ।
साढ़े तीन दशकों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार श्री कपिल भट्ट आज पत्रकारिता के मुक्कमल पायदान पर खड़े हैं । श्री कपिल भट्ट जी बिना किसी की हील हुज्जत के अपना श्रेष्ठ मुकाम हासिल किया हैं । इन्होंने पत्रकारिता के हर क्षेत्र में अपने को श्रेष्ठ साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी हैं ।
पत्रकारिता में आने से पहले इनके सार्वजानिक जीवन में रंगमंच के माध्यम से पहचान बन चुकी थी। स्कूल कॉलेज में ये नियमित सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेता थे। यह शौक इन्हें राजऋषि अभय समाज तक ले आया जिसकी रामलीला में राम और लक्ष्मण तक की लीड भूमिकाएं कीं । भर्तृहरि के नाटक में भी अभिनय किया। बाद में युवा रंगकर्मियों की संस्था पलाश के साथ थैंक्यू मि ग्लाड , मारीच संवाद और बकरी जैसे आधुनिक रंगमंच के नाटकों में भी रोल किये।
इन्होंने 1985 में अलवर से राजस्थान पत्रिका के ब्यूरो प्रभारी बन पत्रकारिता के क्षेत्र में धमाकेदार शुरुआत की ।

कपिल जी का मानना है कि वे एक एक्सीडेंटल जर्नलिस्ट हूँ। बताते हैं मैंने पत्रकारिता की तकरीबन सभी विधाओं को छुआ है। हिंदी इनकी मूल भाषा रही , लेकिन अंग्रेजी में भी खूब हाथ आजमाया। और देश के नम्बर वन अखबार हिंदुस्तान टाइम्स में अलवर से जमकर रपोर्टिंग की। प्रिंट का सतत राही रहा लेकिन इलेक्ट्रॉनिक में भी दखल दिया। पत्रकारिता का सफर अगस्त 1985 को राजस्थान पत्रिका के अलवर संवाददाता के रूप में शुरू हुआ। इससे पहले कॉलेज में पढाई करते हुए ईशमधु तलवार जी के संपर्क में रहकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन किया। इस दौरान दिनमान, कादम्बिनी, शान -ए-सहारा, राष्ट्रदूत में लिखा। तब इनका यह शौकिया पत्रकारिता का दौर था। इनकी खेलों में विशेष रुचि थी इसलिए खेल पत्रकारिता से शुरुआत की । जून 1983 में उस वक्त हुई जब भारत ने इंग्लैंड में क्रिकेट का विष्व कप जीता था। इस पर इनके जीवन का पहला लेख अरूणप्रभा में छपा। फिर तो इन्हें तलवारजी ने लिखने का चस्का लगा दिया।इन्होंने अरूणप्रभा में खेलों पर नियमित लिखना शुरू कर दिया।और अरुण प्रभा का खेल संवाददाता भी बना दिया । राजस्थान पत्रिका ने जब अलवर में अपना कार्यालय खोला तो तलवारजी ने अरूणप्रभा छोड दिया। ये भी तलवारजी के साथ हो लिए।

इस समय तक इनके पत्रकारिता में आने का तनिक भी विचार नहीं था। लेकिन शायद पत्रकारिता को यह मंजूर नहीं था। बात 1985 की है। जब जयपुर से नवभारत टाइम्स शुरू हुआ। तलवारजी ने इस अखबार में जयपुर जाने का तय कर लिया। उनका नवभारत टाइम्स में चीफ रिपोर्टर पद पर चयन हो गया। इधर कपिल जी उनकी जगह राजस्थान पत्रिका अलवर ब्यूरो में संवाददाता के रूप् में नियुक्त हो गए। तब से आरंभ हुई इनकी पत्रकारिता की यात्रा 35 सालों से किसी पहाडी नदी की तरह उछाल खाती हुई अभी तक जारी है। इस वक्त ये सहारा न्यूज नेटवर्क में एसोसिएट एडीटर के पद पर कार्यरत हैं ।इन्होने जयपुर में राजस्थान पत्रिका से लेकर अब तक कोई दर्जन भर से ज्यादा मीडिया संस्थानों में काम किया हैं । जिसमें अंगे्रजी के दो अखबार द पायनियर और हिन्दुस्तान टाइम्स के अलावा राजस्थान के तीनो बडे अखबार राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर और देनिक नवज्योति हैं वहीं प्रतिष्ठित पत्रिका आउटलुक के अलावा नई दुनिया, नेशनल दुनिया जैसे राष्ट्रीय अखबारों का लंबे वक्त तक राजस्थान प्रभारी रहै हैं। इलैक्ट्रोनिक मीडिया में ई टीवी और जी टीवी के साथ भी इन्होंने हाथ आजमाया। कुछ समय फ्री लांसिंग के दौरान बीबीसी हिन्दी में सहयोग किया। सबसे लंबा कार्यकाल अलवर में राजस्थान पत्रिका में 9 सालों का रहा। सन 2005 में कपिल भट्ट जी को राजस्थान में पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतिष्ठित पुरूस्कार माणक अलंकरण दिया गया। इस लंबी यात्रा में क्या लिखा, कैसा लिखा इसका आंकलन करना सम्भव नही है। बस, इतना ही कि इन्होने ने तो ख़बरें लिखीं हैं । काफी उतार-चढाव भी इन्होंने देखे। नौकरियां छोडीं तो संस्थानों के यकायक बंद होने के दंश भी झेले। पत्रकारिता छोडने की कोशिश भी कीं ,लेकिन लगता है की पत्रकारिता इन्हें जकड़े रहना चाहती थी ।

1995 में तो इन्होंने बाकायदा कोटा खुला विष्वविद्यालय में सहायक निदेशक जनसंपर्क के पद पर ज्वाइन भी कर लिया। लेकिन सात दिन में ही उब गया। पत्रकारिता के इस सफर में इन्हें कई महान संपादकों के सान्निध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जिनमे कर्पूर चंद्र कुलिश, राजेंद्र माथुर, विनोद मेहता, आलोक मेहता, चंदन मित्रा जैसे स्वनामधन्य संपादकों को भुलाया ही नहीं जा सकता। सब विरले पत्रकार। कुलिशजी और माथुर साब की गणना तो हिंदी के महान संपादकों में होती है। विनोद मेहता जी का बडा ही गजब का व्यक्तित्व था। वे हमारे समय आउटलुक ग्रुप के प्रधान संपादक थे। एक जबरदस्त पत्रकार थे। उन्होंने अपने पालतू कुत्ते का नाम एडीटर तक रखा हुआ था। उस जमाने में आउटलुक ही ऐसा मीडिया समूह था जिसमें वर्षांत पर क्रिसमस से लेकर नए साल के आने तक 10 दिन छुट्टी रहती थी। इसलिए मैगजीन का एक अंक नहीं निकलता था। आलोक मेहता जी आउटलुक हिंदी के संपादक थे जबकि चन्दन मित्रा पायनियर के संपादक थे। आज के संपादकों में मेरे मित्र और दैनिक भास्कर के राजस्थान संपादक लक्ष्मी प्रसाद पंत उल्लेखनीय हस्ताक्षर हैं। सहारा में आने से पहले इन्हें उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला। इनका मानना है, पंत जी जबरदस्त प्रयोगधर्मी संपादक हैं। युवा पत्रकारों के लिए प्रेरणास्रोत हैं । अलवर में दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक श्री राजेश रवि से इनका विशेष स्नेह है । अन्य पुराने साथियों का भी आभार व्यक्त करते हैं ।
कपिल भट्ट जी स्वस्थ्य और दिर्घायु रहे । आज मेरा जन्मदिन है । कपिलभट्ट जी मेरे पत्रकारिता के सखा हैं । छोटे भाई की तरह हैं ।जीवन मे कई तरह के मोड़ आते हैं ।गलतफहमी हो जाती हैं । लेकिन एक दूसरे के प्रति प्रेम के अंदरूनी जज्बात बरकरार रहते है । इस आलेख के जरिये मैं जन्मदिन को भाई कपिल जी को समर्पित करता हूं । इन्हें जीवन मे खुशहाली मिले । सम्रद्धिशाली बने । इसी कामना के साथ ।

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