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पद देकर झंवर, गोदारा, गोड की प्रतिष्ठा घटाई : हेम शर्मा

सारे कांग्रेस के नेता मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से पद चाहते हैं। राजनीति लोक जीवन में इतनी हावी हो गई है प्रशासन और सत्ता के गलियारों में पद की ही पूछ है। पद नहीं है और अगर आप सार्वजनिक जीवन में कितना ही अच्छा सोचे और करें कोई नहीं पूछता। मान मर्यादा पद की है आदमी की नहीं। अभी पूर्व संसदीय सचिव कन्हैया लाल झंवर, पूर्व विधायक मंगला राम गोदारा, सुनीता गोड समेत कुछ नेताओं को जिला बंदी गृह समिति में पद देना हास्यास्पद है। नियुक्ति से पहले सरकार को व्यक्ति की गरिमा को तो ध्यान में रखना ही चाहिए। झंवर नोखा नगर पालिका में जो काम कर रहे हैं और संसदीय सचिव रहते जो किया है वो राज्य सरकार का अपनाने जैसा मॉडल है। वे राजनीति भी करते हैं और जन सेवा भी। जनता में उनका कितना सम्मान है यह बात मुख्यमंत्री से छिपी नहीं है। मंगला राम गोदारा और शहर कांग्रेस महिला अध्यक्ष सुनीता गोड की भी पार्टी और जनता में अपनी साख है। ये सभी पार्टी और सत्ता में पद के दावेदार रहे हैं। उनको दी गई नियुक्ति उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा को घटाती है। यह तो मुख्यमंत्री भी जानते है कि प्रतिष्ठा पद के पीछे हैं। सत्ता के गलियारे हों अथवा कलक्टर या अफसर पद वाले से अदब से बात करेगा बाकी को टरकाएगा ही। हालांकि ऐसे अधिकारियों की पूछ भी पद तक ही रहती है। फिर वे भी गलियारों में खो जाते हैं। ऐसे हालातों में व्यवस्था में परिवर्तन का जज्बा रखने वालों के लिए भी पद मजबूरी हो गई है। देश में विधायक,सांसद, राज्यपाल आदि बनने की होड़ लगी रहती है। पद लिप्सा इस हद तक है कि पद पाने के लिए 100 करोड़ रुपए देने को तैयार हैं। सत्ता में पदों का इससे महत्व का पत्ता चलता है। अच्छे आदमी की कोई वैल्यू नहीं है। पद गधे को ही मिल जाए तो उसकी आरती उतारने वालों की लम्बी लाईन लग जाएगी। यह समाज की मनोवृति बन गई है। जरा सोचो ये पदासीन लोग अपने कर्तव्य पर कितने खरे हैं। फिर पीछे भागने के क्या मायने है? राजनीति कितना बड़ा स्वार्थ का खेल बन गया है। लोग किसी भी कीमत पर न्यास अध्यक्ष, आयोग, बोर्ड, निगम, विधायक, सांसद,राज्यपाल बनने को तैयार है।
भारतीय लोकतंत्र की यह विद्रूपता है। राजनीति में अगर कोई पद से हट गया है तो पूंछ हिलाते पीछे घूमने वाले भी मुंह फेर लेते हैं। पद आते ही ऐसे लोग सबसे पहले आते हैं। जिला बंदी गृह समिति में पद देकर मुख्यमंत्री ने इन झंवर, गोदारा, गोड जैसे नेताओं की प्रतिष्ठा कम कर दी है।

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