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पश्चिमी राजस्थान का सबसे संभावनाशील जाट नेता डूडी राजनीति से ही अलविदा न कर दे

जयपुर । कांग्रेस के कद्दावर नेता रामेश्वर डूडी अभी एक सियासी शिकस्त से उबरे ही नहीं थे, कि क्रिकेट की पिच पर भी क्लीन-बोल्ड कर दिए गए हैं। सिर्फ एक बिंदु के चलते, जिसमें नागौर क्रिकेट संघ को ललित मोदी के प्रभाव में होने की आशंका है, बीसीसीआई के निर्देशों की रोशनी में, डूडी को बेदखल कर दिया गया है जबकि डूडी के समर्थक न सिर्फ उनके मोदी से जुड़े होने की बात को निराधार मानते हैं बल्कि इस बात पर हैरत भी जता रहे हैं कि कांग्रेस में इस विषय पर बात करने भी कोई आगे नहीं आया। इस तरह हालात में यह माना जा रहा था कि कांग्रेस के ‘समझदार’ कोई रास्ता निकालते, लेकिन इस बार भी वही पुराना खेल हुआ, जो लोग रामेश्वर डूडी की राजनीतिक-महत्वाकांक्षाओं से भयभीत थे, वही हावी रहे।

विधानसभा चुनाव पूर्व उनके मुख्यमंत्री बनने जैसे स्टेटमेंट का उन्हें भुगतान करना पड़ा और उन्हें सीधे मुकाबले में उतार कर पराजित करवा दिया गया, वहीं क्रिकेट की पिच पर भी उन्हें पहली बॉल में क्लीन-बोल्ड कर दिया गया है। स्वास्थ्य के मोर्चे पर पहले ही चुनौती झेल रहे डूडी के लिए लगातार दूसरी शिकस्त इस बात के लिए आशंकित करती है कि पश्चिमी राजस्थान का सबसे संभावनाशील जाट नेता राजनीति से ही अलविदा न कर दे, लेकिन डूडी को जानने वालों का कहना है कि इस तरह की चुनौतियां उनके लिए नई नहीं हैं, धर्मेंद्र के सामने चुनाव लड़ते समय भी वे अकेले पड़ गए थे, लेकिन कड़ा मुकाबला किया। देखना यह है कि बेलगाम हो रहे कांग्रेस संगठन में जिस तरह सत्ता के दो केंद्र साफ दिखाई दे रहे हैं और अशोक गहलोत गुट तुलनात्मक रूप से हावी होता जा रहा है, ऐसे में डूडी सचिन के खेमे में चले जायेंगे या खुद कोई पहल पहल करेंगे। यहां यह उल्लेखनीय है कि डूडी ने अभी तक इस लड़ाई को व्यक्तिगत ही रखा है, जाटों के अस्तित्व से नहीं जोड़ा है तो दूसरी ओर भाजपा से निकटता संबधी सारे कयासों को भी टाला ही है।

राजस्थान में भाजपा जाटों को ही साध नहीं पाई है और सतीश पुनिया इस दिशा में एक अधकचरा-सा प्रयास है, लेकिन हताशा के इस दौर में अगर कोई कदम भाजपा की ओर उठता है तो कहना नहीं होगा कि भाजपा उसे लपकने में कोताही बरतेगी।
सब भविष्य में है, कुछ भी हो सकता है। बहरहाल, कार्यकर्ता इस उठापटक से खासा नाराज़ है, लेकिन उसे अपने नेता के निर्देशों का इंतज़ार है।

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