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फिर भी टी. एम. लालाणी का तो अभिनंदन ही हुआ हेम शर्मा

बीकानेर।बहुप्रतिभा के धनी उद्योगपति टी.एम. लालणी का अभिनंदन क्या हुआ कई सवाल खड़े हो गए। वैसे गुणी जनों के सार्वजनिक अभिनंदन का मतलब उनके गुणों को बतौर प्रेरणा समाज के समक्ष उजागर करना होता है। चाणक्य नीति में कहा गया है कि किसी व्यक्ति के पीछे से उसकी प्रशंसा और सम्मुख आलोचना उसका वास्तविक व्यक्तित्व बताता है। नई लेन ओसवाल पंचायती प्रन्यास की ओर से उनके 31 वर्षों के योगदान के लिए यह अभिनंदन किया गया। इस आयोजन स्थल पर टी एम लालाणी के सामने प्रशंसा करने वाले भी थे और पीछे से उनके कृतित्व की सराहना लेने वाले भी। सामने आलोचना करने वाले नहीं थे। यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि समाज ने उनको खूब सम्मान दिया है। वैसे इस अभिनंदन समारोह में लालाणी के व्यक्तित्व के एक पक्ष पर ही आयोजनकर्ताओ की नजर गई वो प्रन्यास में योगदान। लालाणी जैन समाज में प्रबुद्ध और भारतीय जीवन संस्कृति के पुरोधा माने जाते हैं। साहित्य, कला, संस्कृति, संगीत, फिल्म, खेल, परंपरा और विविध विषयों के ज्ञाता के रूप में उनकी पहचान है। उनकी सृजनधर्मिता की पराकाष्ठा विरासत की संस्कृति, कला, , संगीत, नृत्य की साधना के लिए ऑडिटोरियम बनाना है। कोई व्यक्ति संस्कृति, कला, , संगीत, नृत्य की साधना को कितनी गहराई से आत्मसात कर चुका है_ यह बात उसके क्रिएशन से पता चलती है। टी एम ऑडिटोरियम का सृजन साधना के मंदिर के रूप में अपने अर्जित धन से करना उनकी जीवन साधना का प्रमाण है। जो काम लोक कल्याणकारी सरकारें करने में देरी करती है वो काम टी एम लालाणी ने तुरत फुरत में
किया है। संस्कृति और परंपरागत जीवन मूल्यों की साधना स्थल टी एम ऑडिटोरियम उनकी देन है। उनके इस सृजन में व्यक्तित्व के कई पहलू समाहित है। जिसे हर कोई नहीं देख सकता। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर शुभू पटवा का एक लेख मैने वर्षों पहले पढ़ा था। जो बात उस लेख में कही गई थी उन बातों का इस अभिनंदन समारोह में कोई उल्लेख नहीं था। लालाणी जी की बेटी और टी आर बोथरा ने अपने भाषण में कुछ अंशों का उल्लेख जरूर किया और पुख राज चोपड़ा ने संकेत दिए। बाकी वक्ताओं ने तो केवल उनके प्रति सम्मान, श्रद्धा और अपनापन ही व्यक्त किया। प्रन्यास से जुड़े लोग टी एम का सम्मान तो करते हैं, परंतु वे उनके व्यक्तित्व के कई पक्षों को उजागर नहीं कर पाएं। यह दरअसल उनका अधूरा अभिनंदन है। आयोजन स्मार्ट नहीं रहा। प्रन्यास की उपलब्धियों के गीत गाए गए। अतिथियों का परिचय करवाने के बाद भी मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि की अनावश्यक आरती उतारी जाती रही। प्रन्यास अध्यक्ष का पूरा भाषण अप्रासंगिक रहा। जिसका अभिनंदन किया गया। हर जगह उनको दोयम दर्जे में रखा गया। यह सब जानबूझ कर नहीं किया गया, बल्कि अनजाने में प्लानिंग और समझ की कमी से हो गया। अभिनंदन की बात कम और इतर बातें ज्यादा हुई। भावनाएं बेशक पवित्र थी, पर प्रस्तुति अप्रासंगिक रही। फिर भी लालाणी जी का तो अभिनंदन हो ही गया ?

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