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फिर लौट सकते हैं पत्रकारिता के अच्छे दिन

बीकानेर (सुमित शर्मा ).अब से पूर्व पीढ़ी पत्रकारिता को ऋषि कर्म समझकर पत्रकारिता करती थी। वे सच्चे रूप में लोकतंत्र के आधार स्तंभ थे। अब क्या हो गया है। एक समय था, जब अख़बारों में ख़बर छपती थी, तो लोग उसे प्रमाणित मान लेते थे, आज एक समय है कि अख़बारों में पहले ख़बर छपती है और बाद में जनता उसे प्रमाणित करती है.. सवाल है- क्यों?

एक समय था, जब समाज में पत्रकारिता एक मान-सम्मान वाला पेशा हुआ करता था, आज एक समय है जब पत्रकारिता के लिये गोदी मीडिया, बिकाऊ मीडिया, गिद्ध मीडिया जैसे संबोधन से बुलाया जाने लगा है.

एक समय था, जब पत्रकारों के आने पर राजनेता, सरकारी अधिकारी सम्मान में खड़े हो जाया करते थे.. आज एक समय है कि पत्रकारों को उनसे बात करने के लिये भी इंतज़ार करना पड़ता है. सवाल है- क्यों?

आख़िर पत्रकारिता का पेशा इतना मटमैला क्यों हो गया? ऐसे कई ‘क्यों’ हैं, जिनका जवाब पत्रकारों को ख़ुद से ही पूछ लेना चाहिये. क्योंकि पत्रकारिता की यह परिपाटी रचने के लिये ख़ुद पत्रकारों से ज्यादा कोई जिम्मेदार नहीं है. इस पेशे के लोगों ने अपने स्वाभिमान, अपनी आत्मा को बेच दिया है. यही वजह है कि लोकतंत्र का ये चौथा पिलर लड़खड़ाने लगा है। मीडिया पर लगने लगे हैं.. कहा जाने लगा है कि “जिस मीडिया को जनता के लिये मोमबत्ती होना चाहिये,वो सत्ता के लिये अगरबत्ती हो गई है।”

अब सवाल उठता है कि क्या फिर से पत्रकारिता के अच्छे दिन लौट कर आ सकते हैं? जवाब है- बिल्कुल. अगला सवाल है- कैसे? तो इसका जवाब है-

  1. सबसे पहली जिम्मेदारी बनती है- पत्रकारों की। पत्रकारों को अपने स्वाभिमान की रक्षा करनी होगी. उसे समझना होगा कि कलम के सच से बड़ी कोई ताकत नहीं है. सच खरा होता है, इसलिये खारा होता है. झूठ मीठा लगता है, इसलिये सुहावना लगता है। एक अच्छे पत्रकार को खारे और मीठा के भेद को समझना होगा.
  2. दूसरी जिम्मेदारी है- समाज की। समाज को अच्छे पत्रकारों को संबल देना होगा, उनके साथ खड़ा होना होगा. अगर समाज सच्चे और झूठे के फर्क को समझने लगे तो फिर से अच्छे मीडिया का दौर आ सकता है.
  3. तीसरी जिम्मेदारी है मीडिया हाउसेज की- मीडिया हाउसेज को भी यूनाइटेड होना पड़ेगा. पत्रकारिता लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक है. हमारी ताकत विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से कतई कम नहीं है। फिर किसी भी व्यक्ति, संस्था या सियासत में इतनी ताकत कहां जो प्रेस को झुका सके? लेकिन आज का पत्रकार डरने लगा है, इसलिये झुकने भी लगा है. उसे अपनी ताकत का एहसास ही नहीं रहा. उसे निडर होने का एहसास कराने के लिये सभी मीडिया हाउसेज को भी यूनाइटेड होना पड़ेगा.
  4. पत्रकारिता के पेशे पर जमी धूल को हटाने की जरुरत है. पत्रकारिता के पेशे को सबसे ज्यादा बदनाम किया है- विज्ञापनों ने. आखिर क्यों आजकल मीडिया में जमीनी मुद्दों की बात नहीं होती? वहां सिर्फ वही बात होती है, जो सियासी मुद्दे होते हैं.. क्यों बिजली, पानी, सड़क, रोटी, कपड़ा, मकान कभी ख़बर नहीं बनते? ऐसा इसलिये क्योंकि आज की पत्रकारिता भी इन्हीं मुद्दों से पोषित होती है.. बड़े-बड़े कॉरपोरेट घराने और पॉलिटिकल पार्टीज इन्हीं चीजों को हाइलाइट करने के एवज में मोटे-मोटे विज्ञापन देते हैं. ऐसे में सामाजिक मुद्दे पिछड़ते जा रहे हैं.. जरुरी है- विज्ञापन की इस महंगी हौड़ को खत्म किया जाए.. अगर विज्ञापन की जगह जनता ‘सब्सक्रिप्शन’ बेस्ड मेथड को चुनना शुरु कर दे मीडिया के इनकम की दौड़ खत्म हो सकती है. समाज अच्छे और सच्चे मीडिया हाउसेज की सालाना मेंबरशिप खरीदे, उसके एवज में वो मीडिया हाउस समाज के हितों की खबरे ही दिखाये, न कि कॉरपोरेट और सियासत के मुनाफों की.

मैं तो ये कहूंगा कि सोशल मीडिया के दौर की पत्रकारिता ज्यादा आसान हो गई है. तकनीक ने हमें कई सहूलियतें दे दी हैं.. अगर ऊपर दिये बिंदुओं को हम सब अपना लें तो शायद फिर से पत्रकारिता के अच्छे दिन लौट सकते हैं.

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