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फिर से गलती पर आमादा कुलपति सर्च कमेटी


-डॉ भीमराव अंबेडकर विधि विश्वविद्यालय
-उच्च न्यायालय की पालना से दूर कुलपति सर्च कमेटी

जयपुर, ( हरीश गुप्ता)डॉ भीमराव अंबेडकर विधि विश्वविद्यालय और गलतियों का अजब तालमेल है। यही कारण है कि इतना कुछ बीत जाने के बाद भी फिर से गलत ट्रैक पर है। सही रास्ते पर नहीं आए तो फिर से मुंह की खानी पड़ेगी।
गौरतलब है, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर विधि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ देव स्वरूप की नियुक्ति के बाद से उनकी नियुक्ति पर सवाल पर सवाल खड़े हो गए थे। उनकी डिग्रियों व कार्यप्रणाली आदि को लेकर वे शुरू से चर्चाओं में रहे। जब घिरते नजर आए तो समय से पूर्व विश्वविद्यालय को अलविदा कह गए।
गौरतलब यह भी है कि उनकी नियुक्ति को लेकर शुरू से राज्य के विधि विशेषज्ञ नाखुश थे और उच्च न्यायालय तक की उन्हें शरण लेनी पड़ी। वह अलग बात है कि फैसला आने से पहले देव स्वरूप फैसले को भांप गए और चलते बने।
सूत्रों ने बताया कि हाल ही में उच्च न्यायालय ने उक्त मामले में फैसला सुना दिया।76 पेज के फ़ैसले में उच्च न्यायालय ने डॉक्टर देव स्वरूप की नियुक्ति को जीरो माना है। साथ में यह कहा है कि विधि विश्वविद्यालय का कुलपति उसे बनाया जाए, जिसे लॉ के क्षेत्र में 10 साल बतौर प्रोफेसर पद का अनुभव हो और लॉ के क्षेत्र में कोई शोध कार्य किया हो। साथ ही इस क्षेत्र का विशेषज्ञ हो।
सूत्रों की मानें, तो डॉक्टर भीमराव अंबेडकर विधि विश्वविद्यालय का एक्ट 2019 में बना जिसमें कुलपति की योग्यता के बारे में केवल यही लिखा है कि ’10 वर्ष प्रोफेसर का अनुभव होना चाहिए’। उधर डॉ. देव स्वरूप के जाने के बाद ‘सरकार’ ने इस विश्वविद्यालय के कुलपति के लिए विज्ञापन जारी कर दिया। सर्च कमेटी बना दी। सर्च कमेटी में विज्ञान विषय के एक प्रोफेसर को भी शामिल कर दिया। सवाल खड़ा होता है लॉ के विषय में विज्ञान का क्या काम? इस विश्वविद्यालय से वैज्ञानिक निकलेंगे क्या?
सूत्रों की मानें तो ‘सरकार’ फिर से गलत ट्रैक पर है। सबसे पहले इस विश्वविद्यालय के एक्ट की धारा 11 (2) में संशोधन जरूरी है। उसके बाद सर्च कमेटी को भंग कर नए सिरे से धारा जोड़ते हुए नई सर्च कमेटी बनाई जाए। और उसके बाद कुलपति के लिए विज्ञापन जारी कर आवेदन मांगे। वैसे भी उच्च न्यायालय के फैसले की अनुपालन नहीं की गई तो फिर से कानूनी पेच फंसेगा। वैसे भी अब जो कुलपति बनेगा वह इस विश्वविद्यालय का प्रथम कुलपति कहलाएगा।
देखा जाए तो अब जब कोर्ट ने नियुक्ति को जीरो माना है तो डॉक्टर भीमराव अंबेडकर विधि विश्वविद्यालय का कुलपति बनेगा वह पहला कुलपति कहलाएगा। ऐसे में जब पहला कुलपति बनता है, प्रथम कुलपति की नियुक्ति सरकार के हाथों में होती है। ऐसे में चुनावी वर्ष है सरकार को पूरी जांच कर एक अच्छा कुलपति बनाना चाहिए। प्रथम कुलपति के लिए कोई सर्च कमेटी की भी आवश्यकता नहीं है। कहीं ऐसा ना हो फिर उत्तर प्रदेश के किसी व्यक्ति की लॉटरी खुल जाए। वर्तमान में राज्य के 26 विश्वविद्यालयों में से 14 विश्वविद्यालयों में यूपी के व्यक्ति कुलपति पद पर आसीन हैं। क्या राज्य के शिक्षाविद् कुलपति बनने लायक नहीं है?

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