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मन को स्थिर व नियंत्रित करने का प्रयास करें-साध्वी प्रियरंजनाश्रीजी

बीकानेर, । जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ की वरिष्ठ साध्वीश्री प्रियरंजनाश्रीजी ने रांगड़ी चौक के सुगनजी महाराज के उपासरे में मंगलवार को प्रवचन में कहा कि दिन भर में 60 हजार बार विचार बदलने वाले चंचल मन को स्थिर व नियंत्रित करने का प्रयास करें। अपने भाव व विचार में शुद्धता,शालीनता, सहजता रखें तथा आत्म व मन मंदिर का निरीक्षण, परीक्षण करें। मन को नियंत्रित करने के लिए स्वाध्याय, ध्यान, साधना, आराधना व प्रभु भक्ति करें। झूठ, कपट, हिंसा, बेईमानी से बचें तथा फिजूल विचारों को अपने मन से डिलीट करें।
उन्होंने कहा कि मन, मानव को चिंतन शक्ति, स्मरण शक्ति, निर्णय शक्ति, बुद्धि, भाव , इंद्रियाग्राह्यता, एकाग्रता,व्यवहार, परिज्ञान (अंतरदृष्टि) आदि में सक्षम बनाता है। मन किसी ज्ञातव्य को ग्रहण करने, सोचने व समझने का कार्य करता है। संस्कृत में एक कहावत है ’’मन एवं मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयाःें’’ अर्थात ही मनुष्य के बंधन व मोक्ष का कारण है। मन ही मनुष्यों को सांसारिक बंधनों से बांधता है तथा छुटकारा दिलाता है । जिसने मन को वश में कर लिया उसने संसार को वश में कर लिया। जो मन को न जीतकर स्वयं उसे वश में हो जाता है, वह संसार की अधीनता स्वीकार कर लेता है। मन को जीतने वाला जगत को जीत लेता है। मन न चाहे तो व्यक्ति बड़े से बड़े बंधनों की उपेक्षाकर सकता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में मोबाइल का जरूरत से अधिक उपयोग भी लोगों के मन को बिगाड़ रहा है। मोबाइल के उपयोग से अपनों से अपनापन, शारीरिक श्रम, रिश्ते नातों को भूला रहा है। बच्चों व युवाओं को उम्र से अधिक परिपक्व बना रहा है, उनके मन को बिगाड़ रहा है। बच्चों व युवाओं को धर्म, आध्यात्म, अच्छे संस्कार व संस्कृति से जुड़ने, अपने से बड़ों का सम्मान करने, दूसरों की मदद व सेवा करने बजाएं मोबाइल उनमें हिंसा, फिजूलखर्ची सहित अनेक बुराइयां सीखा रहा तथा आलस्य व प्रमाद को बढ़ावा दे रहा है। अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों व युवाओं को मोबाइल की लत से बाहर निकालने के प्रयास करें।

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