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मरुस्थलीय सम्पदा की भारी क्षति -मरुस्थल में पारिस्थितिकी व पर्यावरणीय बदलाव – हेम शर्मा-

पश्चिमी राजस्थान खासतौर से बीकानेर जोधपुर, बाड़मेर औऱ जैसलमेर के मरुस्थलीय क्षेत्र में इकोलॉजिकल ( पारिस्थितिकी ) औऱ एनवायरमेंट ( पर्यावरणीय) क्षेत्र में पिछले पांच दशकों में भारी नुकसान हुआ है। तालाब नष्ट भृष्ट हो गए हैं। ओरण, गोचर औऱ आगोर अपना स्वरूप खो रहे हैं। इस बदलाव से जन जीवन पर व्यापक असर हो रहा है। मरुस्थलीय प्राकृतिक चक्र, वनस्पतियां, जीव जंतु नष्ट हो रहे हैं। मरुस्थल को भारी क्षति हुई है और होती जा रही है। कोई देखने संभालने वाला नहीं है। सरकार मरुस्थलीय सम्पदा को नष्ट होने दे रही है। बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर इलाकों में ओरण, गोचर, आगोर दरअसल मरुस्थलीय प्राकृतिक वनस्पतियों वाला क्षेत्र, चारागाह, वन क्षेत्र, रेत के टिब्बे, तालाब व खडीन का आगोर एक दूसरे के पूरक क्षेत्र रहे हैं। वास्तव में तो ये इलाके मरुस्थलीय वनस्पति का प्राकृतिक क्षेत्र, पशुओं का चारागाह, वन्य जीव जंतुओं के संरक्ष्ण व संवर्द्धन क्षेत्र, वर्षा जल का आगोर क्षेत्र सम्मिलित रूप से रह है। इन क्षेत्र की भूमियों पर अतिक्रमण औऱ अन्य उपयोग से मरुस्थल की इकोलॉजी औऱ एनवायरमेंट पर प्रतिकूल असर डाला है। आगोर, ओरण, गोचर की भूमि मरुस्थलीय क्षेत्रों में हजारों बीघों में छोड़ी गई थी। ये भूमियाँ प्राकृतिक रूप से मरुस्थलीय वनस्पतियों, वन्य जीव जंतुओं औऱ पर्यावरण की संरक्षक रही है। इन बहाव क्षेत्र के कारण मरुस्थलीय क्षेत्र में जैसलमेर का गड़सीसर, गोविंद सागर, गुलाब सागर, बीकानेर में श्रीकोलायत का कपिल सरोवर, गजनेर झील , गंगापुरा का बंधा वर्षा जल से लबालब रहते थे। यही हाल जोधपुर, बाड़मेर के ऐतिहासिक तालाबों के है। अब गोचर, ओरण, आगोर की भूमि पर कब्जा होने या अन्य उपयोग से यह पारिस्थितिकी औऱ पर्यावरणीय तंत्र खण्डित हो रहा है।। सवाल यह है कि :- 1 कैसे बचें मरुस्थलीय इकोलॉजिकल औऱ एनवायरमेंट सिस्टम 2 कैसे हो वर्षा जल और तालाबों का संरक्ष्ण 3 गोचर, ओरण औऱ चारागाह को कैसे बचाए 4 इन सबको बचा कर मरुस्थलीय सम्पदा को कैसे बचाएँ मरुस्थलीय पर्यावरण और पारिस्थिकी पर विचार कौन करें। किसी को चिंता है तो पहल करें। सरकार अपनी जिम्मेदारी समझेगी ?

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