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महिला सुरक्षा में नाकाम व्यवस्था अब संविधानवाद की धज्जियाँ उड़ाने पर उतारु है

– राजेश भारत
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संविधान से रेप की कुचेष्ठाएं रोकने से ही निकलेगा रास्ता ।
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हैदराबाद , उन्नाव , कठुआ , सिरसा जैसे काण्ड हमारे समाज की एक डरावनी तस्वीर है । उन सब क़त्ल की गई पीड़ित बहिन-बेटियों को श्रद्धांजलि देते हुए इन अपराधों को रोकने व हर स्तर पर महिला सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक तर्क संगत चिंतन-मनन की शुरु करने की जरुरत है , न की एक प्रायोजित उन्मांद में बह कर एक बड़े संकट को आमंत्रित करने की । निश्चिततः रेप जितना ही निन्दनीय तथाकथित एनकाउंटर में मुल्जिमों को मार गिराना है । अनेक मामलों में (विधि की प्रक्रिया अपनाए बिना भी) मार डालने के जिम्मेदारों के संविधान के अनुच्छेद 21 को रौंदते कथन और दृश्य अक्सर देखें जा रहे हैं । क्या हम एक पुलिसिया राष्ट्र राज्य में तब्दील हो गए हैं ? क्या हमारी कानून-व्यवस्था का जनाज़ा निकल चुका है कि न तो हम बहन-बेटियों को दरिंदों से बचाने की माक़ूल व्यवस्था कायम कर पा रहे हैं और ना ही मुल्ज़िमो को कानूनी सज़ा दिलवा पा रहे हैं । यह दुःखद है कि हम मानसिक व व्यवस्थागत तौर पर एक बर्बर राज्य व्यवस्था अपने इर्द-गिर्द ही रचते जा रहे हैं ।

यह बौद्धिक पतन की पराकाष्ठा का भी दौर है जहाँ हमारे नीति-विधि निर्माता/सांसद , दिल्ली राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष आदि भी असंवैधानिक उद्घोष करते हुए कभी बलात्कारियों / मुल्जिमों का मॉब लिंचिंग (भीड़ के हवाले कर मरवाने) की बात कहते हुए संविधान की धज्जियां उड़ाते हैं और इनके चरित्रिक दोगलापन इतना है कि ये कभी बलात्कारी व पीड़ित पक्ष/गवाहों के हत्यारे बीजेपी नेता सांसद व विधायक , कांग्रेस के पूर्व मंत्री , लड़के से दुराचार करने वाले समलैंगिक आरएसएस नेता , संत का भेष लिए भेड़िये धार्मिक डेरा प्रमुखों को भीड़ के हवाले कर मरवाने की तथाकथित “हिम्मत” भरी पैरवी नहीं करते , तो कभी ये धर्म-जाति-सम्प्रदाय को आधार बना कर कानून बनाने की मानवता विरोधी कुचेष्ठाओं को फलीभूत करने की साज़िशें रचते हैं ।

इस तरह की कुचेष्टाएँ , तर्क-विश्लेषणहीन सोच से उपजी कारगुज़ारी कब बलात्कारी – हत्यारे के पक्ष में तिरंगा लेकर निकल पड़े पता ही नहीं चलता । तर्क, विधि और न्याय से रहित एक उन्मांद निहित स्वार्थों से फैलवाया जाता है जिससे अन्ततः नुकसान पीड़ित , जनता , लोकतंत्र , न्याय , मानवता व संवैधानिक मूल्यों का ही होता है । हालिया हैदराबाद के तथाकथित एनकाउंटर पुलिस व सत्ता तो मजबूत हो सकते हैं लेकिन जनता के प्रति ज़वाबदेही , जन-सशक्तिकरण , लोकतन्त्र , कानून का राज कैसे मज़बूत होते हैं ? इससे तो वह सारी अन्वेंषण के प्रक्रिया ही बंद हो जाती है जिसमें सम्भवतया अपराध व अपराधियों के और खुलासे होने थे । सम्भवत: यह उन्मान्दी हो चुके जनमत को बीजेपी और टीआरएस द्वारा अपनी-अपनी ओर मोड़ने का खेल हो , जिसमें फिलहाल टीआरएस आगे निकल गई । या फिर किसी ऊँची पहुँच वाले असल गुनाहगारों को बचाने का खेल भी हो सकता है ।

कानून के सही या ग़लत होने पर मतभेद हो सकते हैं लेकिन मनमाने/तर्कहीन तरीके से एनकाउंटर के नाम पर किसी को मार देना निश्चित ही निन्दनीय है जो रेप पीड़िता बहिन के साथ भी अन्याय है । एक सभ्य लोकतान्त्रिक समाज/देश में पुलिस सहित अन्य सशस्त्र बलों को ऐसे अधिकार कतई नहीं दिए जा सकते । यह तबाही को आमंत्रित करती एक भयावह कारगुजारी है । कुछ लोग अपनी संकुचित सोच व कुंठाओं के चलते इस तथाकथित एनकाउंटर के पक्ष में खड़े हैं लेकिन आम जनता को भी प्रायोजित उन्मांद से बचते हुए तर्क व विश्लेषण आधारित सवाल खड़े करने चाहिए । न्याय पालिका को भी स्वतः संज्ञान लेकर इस या उस बलात्कार के बहाने संवैधानिक संस्थाओं में बैठ कर संविधान से रेप करने की कुचेष्ठाओं से भरे नमूनों को सटीक सन्देश देने की आवश्यकता है

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