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मुख्यमंत्री गहलोत ने बता दिया कि राजस्थान ही सतर्क नहीं वे भी सतर्क हैं, अस्थिरता के डर के बीच सतर्कता !

-:महामारी कोरोना से लड़ाई लड़ रही सरकार का ध्यान बंटा, अब लॉक-अप में चल रही है राजनीति की पाठशाला
● तिलक माथुर
-केकड़ी-राजस्थान
राज्य की जनता इन दिनों राजस्थान की सियासत में अचानक आये बवाल को देख रही है। अब तक राज्य की गहलोत सरकार का पूरा ध्यान महामारी कोरोना से लड़ाई में लगा हुआ था लेकिन पिछले 3-4 दिनों से सरकार का ध्यान अब राज्यसभा चुनाव की तैयारी व सरकार की स्थिरता बनाये रखने की ओर बंट गया है। सरकार के कामदार लॉकडाउन के इस चौथे चरण में खुद लॉक-अप में है, जहां बिना इजाजत के परिंदा भी पर नहीं मार सकता। हां लॉक-अप में राजनीति की पाठशाला अवश्य चल रही है जहां विधायकों को वोट डालने की प्रकिया के साथ अन्य प्रकार के गुर सिखाए जा रहे हैं। पिछले दिनों राजनीतिक घटनाक्रम ने अचानक इतना बड़ा मोड़ ले लिया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। कांग्रेस को डर है कि कुछ ताकतें उसकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिशों में लगी है। डर के कारण भी हैं जिसमें कर्नाटक, मध्यप्रदेश में चला सियासी घटनाक्रम प्रमुख है वहीं कांग्रेस की अंदरूनी फूट व गुटबाजी भी एक बड़ा कारण है जिसकी वजह से किसी भी राजनीतिक घटना से इंकार नहीं किया जा सकता। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से ही कई प्रकार की चर्चाओं, अटकलों ने जन्म ले लिया था।

दरअसल मुख्यमंत्री पद को लेकर इस लड़ाई की शुरुआत हुई। यह लड़ाई थी कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट व दिग्गज नेता अशोक गहलोत के बीच। पीसीसी चीफ पायलट अपनी पांच साल की कड़ी मेहनत से कांग्रेस को पुनः खड़ा करने के दम पर मुख्यमंत्री बनने का हकदार मान रहे थे जबकि गहलोत के समर्थित विधायक अधिक जीत जाने से पाशा पलट गया और गहलोत मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार बन गए वहीं आलाकमान ने भी उन्हें हरी झंडी दे दी। उसके बाद से गहलोत व पायलट के बीच पैदा हुई खाई आजतक नहीं पाटी जा सकी है, जो हम पिछले डेढ़ सालों से देखते आ रहे हैं। पायलट के समर्थकों में भारी रोष चला आ रहा है, पायलट की बयानबाजी से भी गुटबाजी को हवा मिलती रहती है। उनके समर्थक कई विधायकों में अब भी असन्तोष है, वे आज भी पायलट को ही अपना नेता मानते हैं। उनके एक निकट समर्थक विधायक राकेश पारीक तो अपने बयानों में यह कह चुके हैं कि विधायकों को रिजॉर्ट में रखने की जरूरत नहीं थी, हमें कोई खरीद नहीं सकता। हम अपने नेता के साथ हैं आप जानते हैं हमारे नेता कौन है। पारीक का इशारा पायलट की तरफ था कि वे हमारे नेता हैं, हम उनके साथ हैं। ऐसे और कई विधायक हैं जो पायलट के भक्त हैं। ऐसे में कांग्रेस की गुटबाजी दिखाई देती है, लेकिन भाजपा में भी गुटबाजी से इनकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के नेताओं ने इस प्रकार के आरोप लगाते हुए कहा है कि राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा की प्रमुख नेता वसुंधरा राजे के लिए भाजपा के लोग ही लापता होने के पोस्टर छपवा रहे हैं। वैसे भी वसुंधरा राजे अभी राज्य की राजनीति से दूर दिखाई दे रही हैं, उनकी प्रखरता के अभाव में भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेन्द्र सिंह राठौड़ व प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया राजस्थान की भाजपा राजनीति में मुखर हैं बाकी नेता जैसे गायब ही हो गए हैं कभी कभार प्रतिपक्ष नेता गुलाब चंद कटारिया अपनी भूमिका का निर्वहन करते नजर आते हैं। खैर यह कोई नई बात नहीं राजनीति में तो यह भी पता नहीं चलता कि जो आज है वो कल होगा की नहीं और जो आज नहीं है वो कल होगा या नहीं। ऊपर बात चल रही थी कि राजनीति में आपसी फूट की। आपसी फूट का फायदा तो हर कहीं देखने को मिलता है और फिर राजनीति में तो फूट का फायदा परम्परागत रूप से लिया जाता रहा है।

ऐसे में यहां कांग्रेस की अंतर्कलह का फायदा कोई भी दल उठाना चाहता है तो इसमें गलत क्या है, वैसे भी अब राजनीति में मोरल तो बचा ही कहां है। अब तो जिसे मौका मिले वो कोई चूकने वाला नहीं। महाराष्ट्र में यही हश्र हुआ पार्टी की अंदरूनी कलह का फायदा भाजपा ने उठाकर अपनी सरकार बनाली। हालांकि लोकतंत्र में इस प्रकार की घटनाएं अब आम बात हो गई है तो फिर राजस्थान में आश्चर्य किस बात का है। कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि विधायकों की खरीद फरोख्त वाले घूम रहे हैं, तो सवाल यह उठता है जब कोई चीज बिकती है तभी तो खरीददार घूमते हैं। खैर यह राजनीति है यहां हर चीज संभव है, कब क्या हो जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। यहां तो वही चलेगा जिसकी सोच व बुद्धी चाणक्य की तरह काम करेगी।

इस राजनीतिक घटनाक्रम में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपनी जादूगर शैली का एक बार फिर से प्रमाण दे दिया, उन्होंने ये बता दिया कि वे वाकई में कितने सतर्क व कुशल राजनेता हैं। जैसा कि गत दिनों ही उन्होंने कोरोना की लड़ाई में एक स्लोगन दिया था कि राजस्थान सतर्क है, इस स्लोगन की सार्थकता हमें कोरोना की लड़ाई के साथ यहां सियासी लड़ाई में साफतौर पर नजर आई। गहलोत के बारे में कहा भी जाता है कि वे कोई भी काम इतना खामोशी से करते हैं कि सामने वाले को भी भनक तक नहीं लगने देते, वे कितने कुशल शासक हैं ये हम कई बार देख चुके हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जिस प्रकार से विधायकों की खरीद फरोख्त जैसे संगीन आरोप भाजपा नेताओं पर लगाये हैं वे बड़े गम्भीर हैं तथा स्वच्छ राजनीति के लिए चिंता का विषय भी हैं। इन आरोपों में कितना दम है या नहीं यह तो एसीबी व एसओजी की जांच के बाद पता चलेगा। भाजपा तो इस प्रकार के आरोपों को सिरे से नकार रही हैं वहीं कांग्रेस को प्रमाण देने की बात कर रही है। कौन सच्चा है कौन झूठा यह तो जांच से साबित होगा। फिलहाल तो गहलोत की सतर्कता काम कर गई। कांग्रेस सरकार ने फिलहाल अपने आपको सुरक्षित कर लिया है। उसके पास पर्याप्त से अधिक बहुमत है। अब तो किस्मत ही खराब हो तो बात अलग है बाकी कांग्रेस की दोनों सीट को जीतने से कोई नहीं रोक सकता, अगर सबकुछ ठीक रहा तो सरकार को भी अभी खतरा नहीं। हां यह जरूर है अगर ताकतवर शक्तियां पीछे पड़ जाए तो अंदर भी खेल खेला जा सकता है, इतिहास गवाह है कि बहुमत होते हुए भी हार का सामना करना पड़ा है राजनीतिक दलों को। रही बात सरकार को अस्थिर करने की तो, ये प्रयास तो राजनीति में जारी रहेंगे। फिलहाल अभी जो हो रहा है दिख रहा है, भविष्य में क्या होगा किसे क्या पता।

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