_इस जीवन में मोक्ष संभव नहीं, ज्ञान की प्राप्ति संभव –


बीकानेर। सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चरित्र, मोक्ष के यह तीन साधन हैं। मोक्ष में जाने वाले जीव इन तीनों की साधना करते हुए ही मोक्ष की ओर गए तथा भविष्य में भी जाएंगे तो इनकी साधना करते हुए ही जाएंगे। यह सद्ज्ञान श्री शान्त क्रान्ति जैन श्रावक संघ के 1008 आचार्य श्री विजयराज जी महाराज साहब ने जिनवाणी का श्रवण करते हुए दिया। आचार्य श्री साता वेदनीय कर्म के पन्द्रह बोल में से आठवें बोल सम्यक ज्ञान में रमण करता जीव साता वेदनीय कर्म का बंध करता है। विषय पर शुक्रवार को सेठ धनराज ढ़ढ्ढा की कोटड़ी में प्रवचन दे रहे थे।
आचार्य श्री विजयराज जी ने कहा कि हमें इस जन्म में मोक्ष संभव नहीं है। क्योंकि हम अभी पांचवे आरे में हैं और चौथे आरे के मनुष्य ही मोक्ष में जा सकते हैं। पांचवे आरे में मोक्ष की ओर वही जा सकते हैं, जो चौथे आरे में जन्मे हों। लेकिन इस जीवन में हम ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं और जब तक इस संसार में हैं, हमें साता की प्राप्ति होनी चाहिए। महाराज साहब ने बताया कि सम्यम ज्ञान में रमण करता जीव साता वेदनीय कर्म का उपार्जन करता है।
सम्यक ज्ञान की देन क्या है…?। इस पर विचार दृष्टि डालते हुए आचार्य श्री ने बताया कि पवित्रता भरे विचार सम्यक ज्ञान की देन है। हमारे पास विचारों की बड़ी धन-सम्पदा है, शक्ति है। लेकिन विचार कैसे हैं…?। शुद्ध हैं या अपवित्र विचार हैं…?, आज लोगों के विचारों में अपवित्रता है। इसका कारण उनमें सम्यक ज्ञान का नहीं होना है। जिसमें सम्यक ज्ञान होगा, वह विचारों की शुद्धता रखता है। ज्ञानीजनों ने कहा है कि सम्यक ज्ञान की प्राप्ति का थर्मामीटर पवित्रता भरे विचार हैं। जिसमें अपवित्रता नहीं होती, कलुषित नहीं होता उसने समझो सम्यक ज्ञान की प्राप्ति कर ली, उसके विचारों में शुद्धता आएगी।
आचार्य श्री ने कहा कि विचारों का जीवन में बड़ा महत्व है। विचार शुन्य कोई नहीं रहता, संसार में शायद ही ऐसा कोई हो, जिसके मन में कोई विचार ना चलते हों। चाहे पवित्र हो या अपवित्र विचारों का प्रवाह निरन्तर चलता रहता है। जिस दिन सम्यक ज्ञान की प्राप्ति होती है,उस दिन हमारे विचारों में सात्विकता आ जाती है। इसलिए किसी के भी प्रति अपने भावों को नहीं बिगाडऩा चाहिए। भाव किसी के प्रति भी बिगाड़ें, बिगड़ेंगे तो दूसरे के भाव बिगड़े ना बिगड़े हमारे जरूर बिगड़ जाते हैं। इसलिए भावों को नहीं बिगाडऩा चाहिए, क्योंकि इससे ही भव बनता है ओर भव से भाग्य का निर्माण होता है। जैसे हमारे भाव होते हैं, वैसे भव बन जाते हैं और जैसे भव होते हैं, वैसे भाग्य बन जाते हैं। भावों से ही भविष्य बनता है।
_भाग्य का रोना मत रोओ
महाराज साहब ने कहा कि बहुत से लोग भाग्य का रोना रोते रहते हैं। कहते रहते हैं, मैं अभागा हूं , मेरे साथ ये हो गया, वह हो गया और अपने भाग्य को कोसता रहता है। लेकिन बंधुओ, हमारे जैन दर्शन के अनुसार हमारा भाग्य हम बनाते हैं।
भावों को शुद्ध रखो
विचारों का पर्यायवाची है भाव, हम अपने भावों के स्वयं मालिक हैं। अच्छे या बुरे, पवित्र या अपवित्र भाव बनाने के लिए हम स्वतंत्र हैं। किसी का भी आग्रह नहीं होता कि हम भावों को खराब कर लेते हैं। हम अज्ञान, मोह के चलते अपने भाव खराब करते हैं। आचार्य श्री विजयराज जी ने कहा कि भूत हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन अच्छा भविष्य चाहते हो तो अपने भावों को खराब मत करो। इसपर हमें चिंतन करना चाहिए।
_स्वयं का चिंतन करो
आचार्य श्री विजयराज जी महाराज साहब ने कहा कि स्वयं का चिंतन करते रहना चाहिए। जो व्यक्ति स्वयं का चिंतन करता है, वह अपने जीवन में ज्ञान का प्रकाश लाता है और अज्ञानता का अंधकार मिटाता है। जब तक अज्ञान का अंधकार रहता है, हमें सम्यक ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। लेकिन जैसे ही ज्ञान का प्रकाश हमारे अंदर फैलता है, हम अज्ञानता से बाहर निकलने लगते हैं ओर सम्यक ज्ञान के प्रकाश की प्राप्ति होने लगती है। इसलिए कहा गया है सम्यक ज्ञान की देन पवित्रता भरे विचार हैं।
सम्यक ज्ञान का परिणाम क्या है…?, जैन आगम के इस प्रश्न का उत्तर देेते हुए महाराज साहब ने कहा कि जिन्हें सम्यक ज्ञान की प्राप्ति हुई, वह विचारों के धनी बन गए। क्योंकि सारी शुभ प्रवृतियां विचारों की शुद्धता से जुड़ी होती है। इसलिए हर समय यह विचार करते रहो, मन को समझाते रहो, दूसरों के प्रति विचार अशुद्ध नहीं शुद्ध रखो। अगर मन में बुरे विचार किसी के प्रति आ भी जाते हैं तो सजग होकर मन को फटकारो, इससे आपके विचार शुद्धता की ओर बढ़ते चले जाएंगे।
धीरे-धीरे मोड़ तू इस मन को..
आचार्य श्री विजयराज जी महाराज साहब ने प्रेरक भजन ‘धीरे-धीरे मोड़ तू इस मन को, इस मन को.. हां…इस मन को, मन मोड़ा तो डर नहीं, फिर दूर प्रभु का घर नहीं, के माध्यम से अपने मन में धीरे-धीरे बदलाव लाने की बात कही और मन से छल-कपट, चौरी आदि दुष्प्रवृतियों को दूर करने की बात कही। प्रवचन से पूर्व आचार्य श्री ने भजन सुन्दर सुहाना ये अवसर पाया, किस्मत से तूने नर तन पाया, खोयेगा ये जीवन जो तू, विषयों में भरमाएगा, भूलेगा तू कर्तव्यों को, भोगों से टकराएगा। गाकर इसके भावार्थ से श्रावक-श्राविकाओं को अवगत कराया।
आचार्य श्री का जन्मोत्सव को लेकर तैयारियां जोरों पर
श्री शान्त क्रान्ति जैन श्रावक संघ के 1008 आचार्य श्री विजयराज जी महाराज साहब के 64 वें जन्मोत्सव पर श्रीशान्त क्रान्ति जैन श्रावक संघ की ओर से अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। संघ के अध्यक्ष विजयकुमार लोढ़ा ने बताया कि 29 सितंबर को गुरुदेव का जन्मदिवस है। इसको लेकर संघ में उत्साह का माहौल है। श्रावक-श्राविकाएं अनेक धार्मिक कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने में व्यस्त हैं। बाहर से भी बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं का आवागमन सुनिश्चित हुआ है।
