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वर्धा मंथन [६-७ फरवरी,२०२१] से पहले : हे बापू ! हमें माफ़ करना

प्रतिदिन। – राकेश दुबे

हम सेवाग्राम आ रहे है, टोली के कई लोग पहले कई बार आ चुके हैं ।टोली में शामिल, सभी देश की दशा पर चिंतित है ।आगे क्या हो ? कैसे हो ? इस पर मंथन ही उद्देश्य है ३० अप्रेल १९३६ को आप ने यहाँ आकर जो संदेश दिया था, देश उस पर नहीं चल सका । आज देश में किसान और मजदूर आप जैसे किसी पारदर्शी व्यक्तित्व की तलाश में है । आज देश का यह वर्ग बुरी तरह हलकान है,किसान खेत छोड़ धरने पर है और मजदूर कोरोना दुष्काल के कारण बेरोजगारी झेल रहा है।
याद आता है आपका सेवा ग्राम में दिया वक्तव्य, जिसमें वर्णित मन्तव्य पर देश नहीं चल सका । बापू आपने कहा था कि “आप यह विश्वास रखें कि मैं जिस तरह से रहना चाहता हूं, ठीक उसी तरह से आज रह रहा हूं। जीवन के प्रारंभ में ही अगर मुझे अधिक स्पष्ट दर्शन होता तो मैं शायद जो करता वह अब जीवन के संध्याकाल में कर रहा हूं। यह मेरे जीवन की अंतिम अवस्था है। मैं तो नींव से निर्माण करके ऊपर तक जाने के प्रयास में लगा हूं। मैं क्या हूं, यह यदि आप जानना चाहते हैं तो मेरा यहां (सेवाग्राम) का जीवन आप देखिए तथा यहां के वातावरण का अध्ययन कीजिए।“
बापू आपने जो नींव रखी थी, उस पर आपके अनुयायियों को निर्माण करना था देश का निर्माण आज जो भी दिखता है, आपके मन्तव्य के अनुरूप नहीं दिखता ।अपने को सबसे बड़े दल या खुद को उस बड़े का विकल्प कहने वाले राजनीतिक दल के कर्ताधर्ता उससे दूर हैं, जिसे पोथियों में गांधी मार्ग परिभाषित किया गया है।
२५ मार्च १९३९ को आपने हरिजनसेवक में ग्राम सेवक और सत्याग्रहियों की जो योग्यता निर्धारित की थी, उन्हें पूरा न करने वाले आज देश सेवक का तमगा लगाये घूम रहे हैं ।

बापू आपने लिखा था :-
१. ईश्वर में उसकी सजीव श्रद्धा होना चाहिए,क्योंकि वही उसका आधार है । [ईश्वर के नाम पर शपथ लेकर ये क्या गुल गपाड़ा करते हैं, किसी से छिपा नहीं है ।राग, द्वेष और पक्षपात रहित शासन देने की शपथ के लेने बाद, वे इन्हीं दोषों में आकंठ सराबोर रहते हैं]
२. वह सत्य और अहिंसा को धर्म मानता हो [आज सत्य के जगह हर क्षण असत्य का प्रयोग बहुत शान से हो रहा है]
३. वह चरित्रवान हो, और अपने लक्ष्य के लिए जान और माल को कुर्बान करने के लिए तैयार हो [आज देश सेवकों के चरित्र चटखारे का विषय बन चुके है, पर इन्हें कोई लज्जा नहीं है]|
४. वह आदतन खादीधारी हो और सूत कातता हो।इसे आपने हिंदुस्तान के लिए लाजिमी बताया था| [ आपके इस सूत्र की व्याख्या इन देश सेवकों ने कुछ इस तरह की है, कि आज कड़ी देश में महंगा परिधान बन गया है, और सूत कातना वर्ष में एक दिन २ अक्तूबर को प्रचार का माध्यम बन गया है ]
५. वह निर्व्यसनी हो, जिससे उसकी बुद्धि हमेशा स्वच्छ और स्थिर रहे [अब तो देश सेवक घर घर शराब की होम डिलीवरी के सरकारी योजना तक बना रहे हैं]
६. अनुशासन के नियम का पालन [कोई भी देश सेवक किसी अनुशासन में नहीं बंधना चाहता ]।
इस स्थिति में हम इन सब की ओर से क्षमा मांगते हैं।आप हमें शक्ति दें, जिससे राष्ट्र का कुछ शुभ कर सकें ।हम धर्मपाल जी की उस भावना के अनुरूप मंथन करने का वादा भी करते हैं कि “सेवाग्राम कोई पर्यटन केंद्र नहीं है, तीर्थ है”। तीर्थ की हमारी यह यात्रा सार्थक और राष्ट्र के लिए शुभ हो ।” इस आशीर्वाद की आकांक्षा के साथ, एक बार फिर माफ़ करने का आग्रह ।

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