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वाकई संभागीय आयुक्त के पद की गरिमा बढ़ाई : हेम शर्मा

इंदिरा गांधी नहर की जर्जर दशा को सुधारने ( रिलाइनिंग) के काम का निरीक्षण करने, काम की गुणवत्ता का ध्यान रखने के निर्देश तथा इस काम में किसी तरह की जरूरत को पूरा करने में सरकार का पूरा सहयोग का आश्वासन देकर संभागीय आयुक्त ने पद की गरिमा बढ़ाई है। संभागीय आयुक्त चूरू, श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में कई बार जा चुके हैं। उनकी सक्रियता का फायदा वहां के नागरिकों को मिल रहा है। इससे पहले के संभागीय आयुक्त की सरकार के जिम्मेदारी के कामों की अगर तुलना करें तो फर्क नजर आ जाएगा। संभागीय आयुक्त डा. नीरज के. पवन राजस्थान में 0 आर डी से 200 आर डी तक चल रहे रिलाइनिग के काम निरीक्षण किया। हालांकि इस काम के तकनीकी पहलू तो इंजीनियर ही समझ सकते है, प्रशासनिक निरीक्षण से कार्य व्यवस्था पर व्यापक असर हुआ है। संबद्ध जिला कलक्टर, नहर विभाग के अधिकारी संभागीय आयुक्त के साथ रहे इस निरीक्षण से अगर कोई कमी खामी रही हो तो दूर हुई और काम को गति मिली है। नहर विभाग को सरकार और अन्य पक्षों से शायद ही सराहना मिलती होगी, क्योंकि जनता से सीधी जुड़ी नहर की खामियां तो सब को दिखाई देती है। परंतु निष्ठा से किए काम कोई नहीं देखता। संभागीय आयुक्त के समक्ष निरीक्षण में यह बात भी ध्यान में आई होगी कि पिछले वर्ष तत्कालिक मुख्य अभियंता विनोद मित्तल ने कम ठेकेदार होते हुए भी 15 दिनों में 47 किलोमीटर नहर की रिलाइनिंग की। इस बार 56 किलोमीटर में रिलाइनिंग प्रस्तावित है। दो वर्ष में राजस्थान हिस्से में 200 किलोमीटर में रिलाइनिंग का काम पूरा होना है। पंजाब के हिस्से में भी 200 किलोमीटर में यही काम तीन वर्ष में पूरा होगा। दोनों राज्यों में नहर बंदी ( क्लोजर) की अवधि बराबर है। राजस्थान के इंजीनियरों को शाबाशी देने की किसी को फुर्सत होगी ? निरीक्षण के बाद संभागीय आयुक्त को लगता है कि काम ठीक हो रहा तो उनको सराहना तो करनी ही चाहिए। जैसे संभागीय आयुक्त की सार्वजनिक हितों के काम में पहल ( एनिस्टिव) की हर स्तर पर भूरी भूरी प्रशंसा हो रही है। वैसे काम करने वाले और लोग भी हकदार है। ऐसे लोगों के कामों को देखने वाला और शाबाशी देने वाला कोई तो हो।

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