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विकास की कोई सीमा नहीं, क्यो पीछे पीछे भागे


हर जगह विकास, आगे बढ़ना, और विकास करते रहना बस मानव मात्र के दिमाग में यही चल रहा। विकास खर्च के लिए इंसान रात दिन मेहनत कर रहा, सरकार उनसे टेक्स ले रही है जनता कमा कमा कर सरकार को दे रही। कई सामाजिक विकास में लगे, कई देश के विकास में, कई परिवार और स्वयं के विकास में लगे हैं। बहुत कम व्यक्ति ऐसे हैं जिन्होंने एक सीमा बांधी कि भाई इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं चाहिए जो है मैं उससे संतुष्ट हूं। जहां तक विश्व की बात करें सभी देश एक दूसरे से आगे बढ़ने में लगे हैं। कोई चाॅद पर जा रहे, कोई मंगल पर जाना चाह रहा, कोई परमाणु बम बना रहे। परन्तु आज भी पृथ्वी पर ऐसी जगह है कि जहां विकास के बजाय इंसान के जीवन और जीवन शैली पर ध्यान दिया जा रहा कि आदमी जब तक जिंदा है खुश रहे अच्छा खाए पिए स्वस्थ रहें। कई बार विकास की दौड़ में हम इतने बड़े विकास कर बैठे जैसे बडा डैम बना दिया और जब वह फूटता है तो जाने कितनी जाने ले लेता है। परमाणु बम फुटने पर भी अनगिनत जाने गई। बड़ी बड़ी बिल्डिंग बन रही, जब भूकंप आएगा तब क्या होगा। टीवी, मोबाइल आ गये आदमी और बच्चों की जिंदगी पर उसका क्या असर हुआ, बच्चे खेलना, एक्टिविटी भूल गए। कई घरो की महीलाए झगड़ालु टीवी शो देख देख कर अपना मानस खराब कर बैठी। इतिहास के पीछे भी भागना भी गलत है, जो हो गया सो हो गया, आज क्या अच्छा हो उस पर सोचना चाहिए।
अशोक मेहता, इंदौर (लेखक, पत्रकार, पर्यावरणविद्)

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