डिमेंशिया (Dementia) एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसकी शुरुआत अक्सर याददाश्त कम होने से पहले ही व्यवहार और व्यक्तित्व में होने वाले सूक्ष्म बदलावों से हो जाती है। भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लगभग 88 लाख लोग डिमेंशिया से प्रभावित हैं, और वर्ष 2036 तक यह संख्या दोगुनी होने का अनुमान है। चिंताजनक बात यह है कि लगभग 90 प्रतिशत मामलों का समय पर निदान नहीं हो पाता, क्योंकि शुरुआती लक्षणों को सामान्य बढ़ती उम्र का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
विश्व मस्तिष्क दिवस के अवसर पर डॉ. नीतू रामरखियानी, डायरेक्टर – न्यूरोलॉजी , फोर्टिस हॉस्पिटल जयपुर एवं डॉ. विकास गुप्ता, एडिशनल डायरेक्टर – न्यूरोलॉजी , फोर्टिस हॉस्पिटल जयपुर ने आमजन को डिमेंशिया के शुरुआती संकेतों के प्रति जागरूक रहने और समय पर विशेषज्ञ से परामर्श लेने की सलाह दी।
डिमेंशिया के शुरुआती व्यवहारिक संकेत
विशेषज्ञों के अनुसार डिमेंशिया मस्तिष्क के उन हिस्सों को प्रभावित करता है जो व्यक्ति के व्यवहार, निर्णय लेने की क्षमता और भावनाओं को नियंत्रित करते हैं। इसलिए शुरुआती लक्षण केवल भूलने तक सीमित नहीं होते, बल्कि व्यक्ति के स्वभाव और व्यवहार में स्पष्ट बदलाव दिखाई देने लगते हैं।
यदि कोई व्यक्ति अचानक सामाजिक मेलजोल से दूरी बनाने लगे, अपने पसंदीदा शौक में रुचि खो दे, बिना किसी कारण बार-बार गुस्सा या उदासी महसूस करे, या परिवार के सदस्यों पर बेवजह शक करने लगे, तो यह चेतावनी का संकेत हो सकता है। इसके अलावा गलत वित्तीय निर्णय लेना, ऑनलाइन या फोन पर होने वाली धोखाधड़ी का आसानी से शिकार होना, रोजमर्रा के कई चरणों वाले कार्य जैसे भोजन बनाना, दवाइयों का सही समय पर सेवन करना या घर की व्यवस्था संभालने में कठिनाई महसूस होना भी शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। कई बार व्यक्ति चाबियाँ फ्रिज में या मोबाइल किसी असामान्य स्थान पर रखकर भूल जाता है।
किन लोगों में अधिक होता है जोखिम?
65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में डिमेंशिया का जोखिम अधिक होता है, लेकिन केवल उम्र ही इसका कारण नहीं है। अनियंत्रित उच्च रक्तचाप, मधुमेह, उच्च कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, परिवार में इस बीमारी का इतिहास, सिर पर गंभीर चोट, शारीरिक निष्क्रियता, सामाजिक अलगाव, सुनने की समस्या का इलाज न कराना तथा लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहना भी इस बीमारी की संभावना बढ़ाते हैं।
डिमेंशिया की जांच कैसे की जाती है?
यदि व्यवहार में ऐसे बदलाव कई सप्ताह तक बने रहें, तो न्यूरोलॉजिस्ट या जेरियाट्रिक विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। शुरुआत में डॉक्टर स्मृति, ध्यान और सोचने-समझने की क्षमता का आकलन करने के लिए सरल कॉग्निटिव टेस्ट करते हैं। आवश्यकता होने पर एमआरआई (MRI) या पीईटी (PET) स्कैन के माध्यम से मस्तिष्क की स्थिति का मूल्यांकन किया जाता है ताकि स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर या अन्य कारणों को अलग किया जा सके। साथ ही, विटामिन B12 की कमी, थायरॉयड संबंधी समस्याओं जैसी उपचार योग्य स्थितियों की पहचान के लिए रक्त जांच भी कराई जाती है।
मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के उपाय
विशेषज्ञों का कहना है कि मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए हृदय का स्वस्थ रहना भी उतना ही आवश्यक है। नियमित रूप से रक्तचाप, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें। हरी सब्जियों, फलों, मेवों और स्वस्थ वसा से भरपूर संतुलित आहार लें। सप्ताह में कम से कम 150 मिनट व्यायाम करें तथा पढ़ने, पहेलियाँ हल करने और नई चीजें सीखने जैसी मानसिक गतिविधियों में भाग लें। प्रतिदिन 7 से 8 घंटे की पर्याप्त नींद लें और परिवार तथा मित्रों के साथ सामाजिक रूप से सक्रिय रहें।

