यह काम संबंधित ठेकेदार के निर्देश पर होता है जो लाइसेन्स शुल्क, दुकान का किराया व अन्य खर्च अदा करता है। इसकी एवज में सेल्समैन का नौकरनामा लिखवा कर विभाग में जमा करा दिया जाता है। यह भी पता चला है कि देशी व अंग्रेजी मदिरा के ठेकों के लिए शराब के बड़े ठेकेदार परोक्ष रूप से अपने एजेन्टों को लॉटरी के मैदान में उतारते हैं। इसमें लॉटरी शुल्क की राशि तो वे खर्च करते हैं लेकिन कागजी कार्यवाही में उनके रिश्तेदार, विश्सनीय नौकर, दोस्तों और उनके परिवार की महिलाओं का नाम काम में लिया जाता है। इससे सालो साल शराब के ठेके उन्हीं कुनबों की ‘बपौतीÓ बनते चले जाते हैं। सूत्रों ने बताया कि अधिक कमाई वाले शराब ठेकों को अपने नाम लॉटरी निकालने के लिए ठेकेदार एक दुकान के लिए पचास से अधिक फॉर्म अपने परिचितों से ही भरवाते हैं।
इस हिसाब से देखा जाए तो औसत एक दुकान के लिए बीस फॉर्म जमा किए गए हैं। इनमें करीब 25 फीसदी महिलाओं के नाम से फॉर्म जमा होते हैं। अब तक देखने में ये आया है कि उनके नाम की लॉटरी भी निकली है। लेकिन लॉटरी से दुकान आवंटित होने के बाद महिलाएं किसी भी दुकान पर सेल्समैन की हैसियत से काम करती नजर नहीं आतीं। यही हाल एजेन्टों का रहता है, जिनका उपयोग केवल फॉर्म भरने व उसकी एवज में कुछ रकम देने तक ही किया जाता है।
यह होता है नौकरनामा में
नौकरनामा में यह उल्लेखित होता है कि यदि दुकान में आबकारी नियमों की अनदेखी या उल्लंघन होता है तो उसकी समस्त जिम्मेदारी लाइसेन्सी की होगी। सूत्रों का कहना है कि इस प्रक्रिया के चलते कई बार ऐसा भी होता है कि राजस्थान में दुकानों पर प्रतिबंधित शराब बेचे जाने के मामलों में लाइसेन्सी यह कहकर मुकर जाते हैं कि उनकी जानकारी में नहीं है इसलिए नौकर ही जिम्मेदार है। हालांकि कहने को शराब के कारोबार से शराब माफिया व ठेकेदारी सिस्टम को मुक्त करने के लिए लॉटरी प्रक्रिया लागू की गयी थी, किन्तु आज भी शराब का धंधा माफिया के चंगुल में फंसा हुआ है।