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संपूर्ण देश के मतदाताओं को एक नजरिए से नहीं देखती राजनैतिक पार्टियाँ

राजनैतिक पार्टियां लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जीत के गणित बिठाने में व्यस्त हैं। वैसे तो राजनैतिक पार्टियां वर्षभर इसी काम में लगी रहती है, राजनैतिक दलों का मुख्य काम चुनाव लड़ना, सरकार बनाना और राजनीति करना। क्योंकि भारत में हर प्रदेश के विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय होते हैं। दिल्ली में केजरीवाल सरकार के तौर-तरीकों को लगभग सभी पार्टियों ने स्वीकार कर लिया है। पहले केजरीवाल को रेवड़ी बांटने वाला करार दिया। जब विधानसभा चुनाव में अपनी बारी आई तो उन्हीं पार्टियों ने उस तरकीब को जीत की जादुई छडी मान लिया। राजनैतिक दलों ने केजरीवाल फॉर्मूले को लागू करने में ही भलाई समझी। केजरीवाल ने बिजली फ्री करने का ऐलान किया शेष राष्ट्रीय पार्टियों ने भी इसे कवच के रूप में लिया। इससे उपभोक्ताओं को ही लाभ होना है। यहां सवाल इतना सा है कि चुनाव घोषणा पत्र पांच साल के लिए होता है या चुनाव जीतने भर के लिए? चुनाव घोषणा पत्र में जो वादे किए जाते हैं जैसे बिजली फ्री करने का, विकास का लेकिन उन वादों पर पूरे पांच साल खरा रहने और काम करने का मतदाताओं से समझौता है। उस राजनैतिक दल की सरकार घोषणा-पत्र की घोषणाऍ पूरी नहीं होती और कुछ होनी शुरू होती है तो बीच में ही दम तोड़ दी जाती है अगर किसी पार्टी ने फ्री बिजली, फ्री शिक्षा अथवा अन्य सुविधाओं का वादा किया है तो उसे पूरे पांच साल तक कम नहीं किया जाना चाहिए। इस पर चुनाव आयोग को भी ध्यान देना होगा।
परंतु राष्ट्रीय पार्टियों को केजरीवाल की पार्टी से सीख भी लेनी चाहिए क्योंकि अब तक केजरीवाल की पार्टी दिल्ली तक सीमित थी फिर उसने पंजाब, गुजरात और हरियाणा में भी चुनाव लड़ा उस राज्य में केजरीवाल की पार्टी ने अपने घोषणा पत्रों में वही घोषणाएं की जो दिल्ली में लागू की गई। अब समस्या दूसरी है की राष्ट्रीय पार्टियां जब विधानसभा के चुनाव में उतरती हैं तब वे हर प्रदेश में अलग-अलग फार्मूला लागू करती है जो सरासर गलत है। कांग्रेस पार्टी ने हिमाचल प्रदेश एवं कर्नाटका में 400 यूनिट 300 यूनिट कहीं 200 यूनिट और राजस्थान में मात्र 100 यूनिट बिजली फ्री का ऐलान किया। क्या कांग्रेस पार्टी हर प्रदेश में अलग है जेंडर से चलती है। मतदाताओं को यह सोचना होगा कि हम किसी राष्ट्रीय पार्टी को चुनते हैं तो फिर गुजरात के चुनाव घोषणा पत्र और राजस्थान के चुनाव घोषणा पत्र में अलग-अलग वादे क्यों ? गुजरात में जब चुनाव थे तो कांग्रेस पार्टी ने वरिष्ठ जनों को जितनी पेंशन देने की राशि कुछ और तय की थी तो वह वादा राजस्थान में क्यों नहीं, खुद राजस्थान के मुख्यमंत्री ने गुजरात के मतदाताओं से कांग्रेस पार्टी के अधिकृत नेता के रूप में वादा किया था कि अगर कांग्रेस की सरकार बनती है तो हम यह सुविधाएं देंगे राजस्थान के मतदाता बतौर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से यह पूछना चाहते हैं कि जो वादे आपने गुजरात के मतदाताओं से किए क्या आप राजस्थान के मतदाताओं को वह सुविधाएं देना नहीं चाहते हैं, यह सवाल मतदाताओं के लिए विचारणीय है । छत्तीसगढ़ में 200 यूनिट बिजली फ्री देने का वादा किया 400 यूनिट तक बिजली खपत वालों पर आधा भुगतान करने की छूट दे दी, हिमाचल में 125 यूनिट तक बिजली फ्री दी जा रही है। कहा यह जाता है कि वहां कोयला सस्ता मिलता है, इसके मायने यह हुए कि राजस्थान में मतदाता सस्ता मिलता है। इसलिए उनको महंगी बिजली दी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी भी इसी तरीके के फार्मूले लाती है उसने तो हिमाचल में और कर्नाटका में जो फार्मूले लागू किए थे, जो चुनाव घोषणा पत्रों में वादे किए थे क्या वही वादे राजस्थान में किए जाएंगे, यहां मतदाताओं को सोचना होगा की राष्ट्रीय पार्टियां जिस तरीके से प्रदेशो में भेदभाव कर रही है, उनको अभी समझ नहीं आ रहा है जब तक समझ आएगा उन राज्य में क्षेत्रीय पार्टियां जन्म ले लेगी। क्षेत्रीय पार्टियों का जन्म लेना और फिर धीरे-धीरे जमीन तलाशते हुए अपना व्यापक स्तर पर जनादेश प्राप्त कर लेना, उसके पीछे यही एक वजह होती है कि मतदाताओं को लगता है की क्षेत्रीय पार्टियां एक तो स्वतंत्र होती है, दूसरी उनके हित भी क्षेत्रीय होते हैं, और तीसरे उनकी सोच भी क्षेत्रीय होती है। इसलिए मतदाता उन पर भरोसा कर लेते हैं राष्ट्रीय पार्टियों को पूरे हिन्दुस्तान के मतदाताओं के साथ एक जैसा व्यवहार और आचरण अपने कार्य एवं चुनाव घोषणापत्र में करने होंगे। आने वाले समय में राजस्थान, मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं जो भारत के बड़े राज्यों में गिने जाते हैं। यहां के मतदाताओं को भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के वादों पर व्यापक नजर रखनी होगी और उन्हें इस बात के लिए प्रेरित और शिक्षित करना होगा कि वह एक जैसा व्यवहार पूरे देश के मतदाताओं के साथ रखें। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव घोषणा पत्रों में मतदाताओं को दिए जाने वाली सुविधाओं में भेदभाव ना करें, मतदाता तो जैसा राजस्थान का है वैसा गुजरात का है मध्यप्रदेश का भी मतदाता वही है और वैसा ही दिल्ली का मतदाता है।

*राजेन्द्र जोशी*
कवि-कथाकार
लेखक हिन्दी और राजस्थानी भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार है।

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