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सुपुर्दगी बहाना या फिर खेल :पशु तस्करी के हकितकत को दफनाने में जुटे दागदार

उत्तर प्रदेश से होकर बिहार को की जाने वाली शराब व पशुओं की तस्करी की रफ्तार पहले से कहीं अधिक बढ़ गयी है। बिहार में उत्तर प्रदेश सीमा के आगे लगातार हो रही शराब की बरामदगी यह बताने के लिए काफी है कि शराब के अवैध कारोबारियों का इंकलाब कैसे बोल रहा है। ठीक वही स्थिति पशु तस्करी की भी है। यह दीगर बात है कि हम तस्करी का सारा ठीकरा बिहार बार्डर पर तैनात अधिकारियों पर लाकर फोड़ देते है। लेकिन सच्चाई को भी तो नहीं झुठला सकते।
बिहार सीमा पर हाइवे पर स्थित बहादुरपुर पुलिस चौकी हो या फिर हाइवे से जुड़ा गोरखपुर जिले से लगा सुकरैली पुलिस चौकी इनका दायित्व अधिक है। सुकरैली से होकर शराब व पशुओं की गाड़ियां जनपद में प्रवेश करती है हो बहादुरपुर से बिहार में प्रवेश करती है। इन दोनों पुलिस चौकियों पर पर्याप्त मात्रा में पुलिस बल तैनात है, तो बहादुरपुर पुलिस चौकी पर जनपद के कुछ थानों के लगभग बराबर भी कह सकते है।
बहादुरपुर पुलिस चौकी पर तरयासुजान थाने व दूसरे पुलिस चौकियों पर तैनात लोग भी अपने जोगाड़ के दम पर पोस्टिंग कराकर बैठे है।
कुछ लोग तो ऐसे भी है जो चल फिर भी नहीं सकते लेकिन हाइवे से इतर रहना भी उन्हें गवारा नहीं। तो कुछ लोग ऐसे भी है जिनकी निगरानी कोई और करता है और वे हाइवे पर गोरखपुर से बहादुरपुर तक अपने लग्जरी कार के रफ्तार के साथ आनन्द का लुफ्त लेना ही दिनचर्या बना लिए है।

– सुपुर्दगी

सूत्रों की माने तो पुलिस यह मानती है कि तस्करी कर ले जाये जा रहे पशुओं की बरामदगी क्यों करें, बरामदगी के बाद पशुओं के सुपुर्दगी के बाद जो हो हल्ला होता है, उसके बाद उसकी मुश्किलें बढ़ जाती है। ऐसे में वे चाहकर भी बरामदगी से दूरी बना रहे है। अब यह गणित समझ में नही आ रहा। बरामद पशुओं को अगर पशु पालकों या फिर किसानों को मिले तो हो हल्ला कौन करेगा। लेकिन तस्करी में लगे लोगों को पशु सुपुर्दगी में दिए जाएंगे, और अगले दिन ही उनके दरवाजे से पशु गायब हो जायेगें तो चर्चा तो होगी ही।
तर्क सबका अपना अपना हो सकता है, लेकिन कर्तव्य और जिम्मेदारी तो निश्चित है। ऐसे में ‘सुपुर्दगी’के समस्या को बता बरामदगी पर विराम समझ से परे है।

अशोक वत्स, JST, तमकुहीराज, कुशीनगर।

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