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सुप्रीम कोर्ट ने “स्किन टु स्किन टच “ को “पोक्सो एक्ट “ मानते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को पलटा

नई दिल्ली,(दिनेश शर्मा “अधिकारी”)। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि किसी नाबालिग के ब्रेस्ट को कपड़े के ऊपर से पकड़ने को यौन उत्पीड़न नहीं माना जा सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच की जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने पोक्सो) एक्ट का हवाला देते हुए कहा था कि इस कानून के तहत अगर स्किन-टु-स्किन कॉन्टैक्ट (शारीरिक सम्पर्क) नहीं हुआ तो उसे यौन शोषण नहीं कहेंगे। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस यूयू ललित, एस रविंद्र भट और बेला त्रिवेदी की बेंच ने कहा कि ‘टच’ (छूना) के अर्थ को ‘स्किन-टु-स्किन’ (त्वचा सम्पर्क) तक सीमित करने से पॉक्सो कानून की बेहद संकीर्ण और बेहूदा व्याख्या निकलकर आएगी। इससे कानून का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा, जिसे हमने बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए लागू किया था। कोर्ट ने कहा कि पहने हुए कपड़ों या किसी अन्य कपड़े के ऊपर से बच्चे को गलत नीयत से छूना भी पॉक्सो एक्ट में आता है। कोर्ट को सीधे-सरल शब्दों के गूढ़ अर्थ निकालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। ऐसी संकीर्ण और रूढ़िवादी व्याख्याओं से इस कानून को बनाने का उद्देश्य विफल होगा, जिसकी हम इजाजत नहीं दे सकते। 27 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई थी, जिसमें आरोपी को बरी किया गया था। मामला नागपुर का है। वहां रहने वाली 16 साल की लड़की की ओर से यह केस दायर किया गया था। घटना के समय उसकी उम्र 12 साल और आरोपी की उम्र 39 साल थी। पीड़िता के अनुसार दिसंबर 2016 में आरोपी सतीश उसे खाने का सामान देने के बहाने अपने घर ले गया था। उसके ब्रेस्ट को छूने और निर्वस्त्र करने की कोशिश की थी। सेशन कोर्ट ने इस मामले में पॉक्सो एक्ट के तहत तीन साल और आईपीसी की धारा 354 के तहत एक साल की सजा सुनाई थी। ये दोनों सजाएं एकसाथ चलनी थीं। मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच की जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने 12 जनवरी को अपने आदेश में कहा था कि 12 साल की बच्ची से यौन शौषण के ऐसे सबूत नहीं मिले हैं, जिससे साबित हो सके कि उसका टॉप उतारा गया या फिर शारीरिक सम्पर्क हुआ। इसलिए इसे यौन अपराधों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। जस्टिस गनेडीवाला ने सेशन कोर्ट के फैसले में संशोधन करते हुए दोषी को पॉक्सो एक्ट के तहत दी गई सजा से बरी कर दिया था, जबकि आईपीसी की धारा 354 के तहत सुनाई गई एक साल की कैद को बरकरार रखा था। उल्लेखनीय है कि पॉक्सो एक्ट के तहत गलत नीयत से किसी बच्चे का सीना, जननांग छूना या फिर उससे ऐसा कराना या ऐसी हरकत करना, जिसमें फिजिकल कॉन्टैक्ट होता हो, ये सभी चीजें यौन शोषण हैं।

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