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हीरो बने संभागीय आयुक्त

बीकानेर,. हेम शर्मा । संवित सोमगिरि जी महाराज इस लोक में नहीं रहे। वे आम जन के लिए सहज सुलभ थे। कोई बुलावो वे सहज रूप से आ जाते। विद्वान उच्च कोटि के थे।इस संत की सहजता से बीकानेर का जनजीवन अभिभूत रहा। हर कोई खुद को स्वामी जी के निकट मानता था। कमोबेश जनता के खातिर ऐसी सहजता संभागीय आयुक्त नीरज के पवन में भी है। आश्चर्य बीकानेर में सैकड़ो लोग नीरज के पवन को अपना खास मानते। इस विश्वास के मायने क्या है? क्या वाकया नीरज का सोच, कृत्य, व्यवहार और यहां तक जीवन भी जनता को समर्पित हो गया है? बीकानेर संभागीय आयुक्त का पद राजस्थान में मुख्य भूमिका ( हीरो) में है। सार्वजनिक क्षेत्र में संभागीय आयुक्त जनता के साथ कहां दिखाई नहीं देते? जनता की खूब सुनते हैं।जो बन पड़ता है कर देते हैं और कुछ नहीं तो मुस्कान तो देते ही है। फील्ड में घूमते हैं। जनहित में सोचते है। कुछ कुछ करते ही रहते हैं। अतिक्रमण केवल करने वाले की सुविधा है। बाकी जनता के लिए परेशानी का सबब।जिलेभर में घूम घूम कर संभागीय आयुक्त ने कितने कब्जे हटाए है। कब्जाधारियों के आका सत्तासीन नेता होते हैं उनके दवाब को इग्नोर करना भी जोखिम का काम है। कोई भी अफसर कब्जा हटाने की कार्रवाई से बचना चाहते हैं। पवन चलाकर यह जोखिम जनहित में ले रहे हैं। जनता खुश है। गोचर से कब्जे भी संभागीय आयुक्त ने हटाए। ऐसा कोई सार्वजनिक क्षेत्र नहीं बचा जिसमें संभागीय आयुक्त ने सक्रियता नहीं दिखाई हो। राष्ट्रीय ध्वज फहराना हो या चिल्ड्रन पार्क में बच्चों को मनोरंजन देना। बीकानेर में जनता की जुबान पर है कि संभागीय आयुक्त हर जगह मिल जाते हैं। उनके बीकानेर में जनहित में किए कामों की लंबी फेहरिस्त है। जो दर्शाती की इस अधिकारी का विजन हमारे जनप्रतिनिधियों से ज्यादा गहरा( पेना) है। बीकानेर की जनता मुक्तकंठ से कहने लगी है ऐसा संभागीय आयुक्त भूतो न भविष्यते। क्या राजस्थान में भी ऐसा कोई संभागीय आयुक्त है? उद्देश्य प्रशंसा करना नहीं है, बल्कि काम का विश्लेषण है। राह चलते संभागीय आयुक्त ने रसोई गैस की रिफिलिंग पकड़ी यह कार्य दक्षता नहीं तो क्या है? गैस की चोरी, साथ में दुर्घटना को न्योता। जिम्मेदार लोग आज भी आंख मूंदे बैठे है। संभागीय आयुक्त की सक्रियता बाकी लकीर के फकीर अफसरों के लिए प्रेरणा क्यों नहीं बन पा रही है। अफसर दफ्तर आते हैं। फाइल रगड़ते हैं और चले जाते हैं। जन हित से कोई लेना देना नहीं। जनता की पीड़ा के प्रति कोई संवेदना है भी ? मिटिंगे लेना कर्तव्य को इतिश्री। ऐसे अफसर नीरज के पवन से सीख लें तो ही उनका प्रशासन में होना सार्थक हो सकेगा। बीकानेर कलक्टर की प्रशासनिक दक्षता रानी बाजार के अंडर ब्रिज और मोहता सराय के चौराहे में प्रतिबिंबित हो रही हैं। ऐसा यूआईटी चेयरमैन फिर कभी आना नहीं। यह भी देखो संभागीय आयुक्त महोदय। बड़े अधिकारी के नाते आपकी भी ड्यूटी है।

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